करबला के बाद क्या हुआ? (Karbala Ke Baad Kya Hua) Part 3 | 11 मुहर्रम का दर्दनाक सच

करबला के तपते हुए रेगिस्तान में 10 मुहर्रम को जो दर्दनाक वाक़िया पेश आया, उसने पूरी उम्मत को गहरे ग़म में डाल दिया। इससे पहले हमने अपने पिछले लेख बैटल ऑफ़ करबला (Battle of Karbala) Part 2 में पढ़ा था कि किस तरह हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) और उनके वफ़ादार साथियों ने दीन-ए-इस्लाम (Deen-e-Islam) की हिफ़ाज़त के लिए अपनी जानें क़ुर्बान कर दीं।

लेकिन अक्सर लोगों के ज़ेहन में यह सवाल आता है कि आखिर करबला के बाद क्या हुआ? (Karbala Ke Baad Kya Hua) उन मासूम बच्चों और ख़वातीन (Women) के साथ क्या हुआ जो ज़िंदा बच गए थे? यज़ीद (Yazid) का अंजाम क्या हुआ?

आइए, इस सीरीज़ (Series) के तीसरे और आख़िरी हिस्से में मशहूर तारीखी रिवायतों (Historical Narrations) की रौशनी में इन सवालों के जवाब जानते हैं।

11 मुहर्रम : ख़ेमों को जलाया गया और अहले बैत को क़ैदी बनाया गया

10 मुहर्रम की शाम, जब हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) और उनके साथियों की शहादत हो चुकी, तो ज़ुल्म यहीं पर ख़त्म नहीं हुआ। मशहूर तारीखी रिवायतों के मुताबिक़, उमर बिन सअद (Umar ibn Sa’d) के लश्कर ने हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) के ख़ेमों में आग लगा दी। ख़ेमों में मौजूद अहले बैत की ख़वातीन और मासूम बच्चों के पास पनाह लेने की भी कोई जगह नहीं बची।

उस वक़्त मर्दों में सिर्फ़ हज़रत इमाम अली ज़ैनुल आबिदीन (रज़ियल्लाहु अन्हु) ज़िंदा थे। मशहूर रिवायतों के मुताबिक़, वह उस समय सख़्त बीमार थे और जंग में हिस्सा लेने की हालत में नहीं थे।

11 मुहर्रम को हज़रत बीबी ज़ैनब (रज़ियल्लाहु अन्हा), बीबी सकीना (रज़ियल्लाहु अन्हा), हज़रत इमाम अली ज़ैनुल आबिदीन (रज़ियल्लाहु अन्हु) और अहले बैत (Ahl al-Bayt) के दूसरे अफ़राद को क़ैदी बना लिया गया। इसके बाद उन्हें करबला से कूफ़ा की तरफ़ ले जाया गया। यह सफ़र अहले बैत (Ahl al-Bayt) के लिए बेहद दर्दनाक और मुश्किल था, क्योंकि उन्होंने अपने सामने अपने अज़ीज़ों की शहादत देखी थी और अब उन्हें क़ैद की हालत में सफ़र करना पड़ रहा था।

कूफ़ा से दमिश्क तक का सफ़र और हज़रत बीबी ज़ैनब (रज़ियल्लाहु अन्हा) का तारीखी ख़ुत्बा

मशहूर तारीखी रिवायतों के मुताबिक़, अहले बैत (Ahl al-Bayt) के क़ाफ़िले को सबसे पहले कूफ़ा में उबैदुल्लाह इब्न ज़ियाद (Ubaidullah ibn Ziyad) के दरबार में पेश किया गया। इसके बाद उन्हें शाम (Shaam) के शहर दमिश्क (Damascus) ले जाया गया, जहाँ यज़ीद (Yazid) का दरबार था। इस पूरे सफ़र के दौरान अहले बैत (Ahl al-Bayt) को बेहद तकलीफ़ों और मुश्किल हालात का सामना करना पड़ा।

मशहूर तारीखी रिवायतों में आता है कि जब अहले बैत (Ahl al-Bayt) को यज़ीद के दरबार में पेश किया गया, तो हज़रत बीबी ज़ैनब (रज़ियल्लाहु अन्हा) ने पूरे सब्र, हिम्मत और यक़ीन के साथ एक तारीखी ख़ुत्बा (Speech) दिया, जिसने वहाँ मौजूद लोगों को झकझोर कर रख दिया।

मशहूर रिवायतों में उनके ख़ुत्बे का यह मज़मून बयान किया जाता है:

“ऐ यज़ीद! तू जितनी चाहे कोशिश कर ले, लेकिन तू हमारे नाम और हमारी याद को लोगों के दिलों से कभी नहीं मिटा सकेगा।”

हज़रत बीबी ज़ैनब (रज़ियल्लाहु अन्हा) के इस अज़्म, सब्र और हिम्मत ने दुनिया को यह पैग़ाम दिया कि हक़ (Truth) को कभी भी ज़ुल्म, ताक़त या ज़ंजीरों में क़ैद नहीं किया जा सकता।

रसूलुल्लाह ﷺ के पाकीज़ा ख़ानदान की इसी अज़मत (Greatness), सब्र और क़ुर्बानी का ज़िक्र हमने इमाम हुसैन की जीवनी (Imam Hussain Biography) में भी तफ़सील (Detail) से किया है।

अहले बैत की आज़ादी और मदीना वापसी

मशहूर तारीखी रिवायतों के मुताबिक़, जब यज़ीद के दरबार में करबला के दर्दनाक वाक़िये की हक़ीक़त लोगों के सामने आई, तो कई लोग गहरे ग़म में डूब गए। दरबार और शहर के लोगों में भी इस घटना को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ सामने आईं।

कुछ रिवायतों के मुताबिक़, अपनी हुकूमत पर बढ़ते दबाव और लोगों की नाराज़गी को देखते हुए यज़ीद ने इस पूरे वाक़िये की ज़िम्मेदारी उबैदुल्लाह इब्न ज़ियाद (Ubaidullah ibn Ziyad) पर डालने की कोशिश की।

इसके बाद मशहूर रिवायतों के अनुसार, अहले बैत (Ahl al-Bayt) को रिहा कर दिया गया और उन्हें इज़्ज़त के साथ मदीना (Madina) लौटने की इजाज़त दी गई। जब कुछ दिनों बाद यह क़ाफ़िला मदीना (Madina) पहुँचा, तो पूरे शहर में ग़म की लहर दौड़ गई। रसूलुल्लाह ﷺ के नवासे और उनके वफ़ादार साथियों की शहादत की ख़बर सुनकर हर आँख अश्कबार थी और हर दिल ग़मगीन था।

आज भी जब लोग मुहर्रम (Muharram) का महीना आने पर “2027 मुहर्रम कब है ? (2027 Mein Mohharam Kab Hai)” जैसे सवाल तलाश करते हैं, तो उसके पीछे सिर्फ़ तारीख़ जानना ही मक़सद नहीं होता, बल्कि करबला (Karbala) की क़ुर्बानी, सब्र और दीन-ए-इस्लाम (Deen-e-Islam) की हिफ़ाज़त की उस अज़ीम दास्तान को याद करना भी होता है।

यज़ीद का अंजाम क्या हुआ?

करबला के बाद क्या हुआ? (Karbala Ke Baad Kya Hua) यह जानने की कोशिश करने वाले बहुत से लोग यह भी पूछते हैं कि यज़ीद (Yazid) का आख़िर क्या अंजाम हुआ। तारीखी रिवायतों के मुताबिक़, करबला के वाक़िये के लगभग तीन साल बाद, 64 हिजरी में यज़ीद बिन मुआविया (Yazid ibn Muawiya) की मौत हो गई। उसकी उम्र के बारे में अलग-अलग तारीखी रिवायतों में विभिन्न विवरण मिलते हैं, लेकिन आम तौर पर उसकी उम्र लगभग 36 से 38 वर्ष बताई जाती है।

उसकी मौत की वजह के बारे में भी तारीखी किताबों में अलग-अलग रिवायतें मौजूद हैं। कुछ इतिहासकार बीमारी का ज़िक्र करते हैं, जबकि कुछ दूसरी रिवायतें बयान करते हैं। इसलिए किसी एक वजह को निश्चित तौर पर कहना सही नहीं होगा।

क़ुरआन-ए-पाक में अल्लाह तआला फ़रमाता है:

“फिर देखो, ज़ालिमों का अंजाम कैसा हुआ कि उनके ज़ुल्म की वजह से उनकी बस्तियाँ उजड़ गईं।” (सूरह अन-नम्ल, आयत: 52)

Frequently Asked Questions (FAQs)

Q1: करबला के बाद ज़िंदा बचे हुए अहले बैत (Ahl al-Bayt) के साथ क्या हुआ था?
Ans: मशहूर तारीखी रिवायतों के मुताबिक़, करबला (Karbala) के वाक़िये के बाद हज़रत इमाम अली ज़ैनुल आबिदीन (रज़ियल्लाहु अन्हु), हज़रत बीबी ज़ैनब (रज़ियल्लाहु अन्हा), हज़रत बीबी सकीना (रज़ियल्लाहु अन्हा) और अहले बैत (Ahl al-Bayt) की दूसरी ख़वातीन और बच्चों को क़ैदी बनाकर पहले कूफ़ा और फिर दमिश्क (Damascus) ले जाया गया।

Q2: हज़रत बीबी ज़ैनब (रज़ियल्लाहु अन्हा) ने यज़ीद (Yazid) के दरबार में क्या किया था?
Ans: मशहूर तारीखी रिवायतों के मुताबिक़, हज़रत बीबी ज़ैनब (रज़ियल्लाहु अन्हा) ने यज़ीद के दरबार में बेहद हिम्मत और सब्र के साथ एक असरदार ख़ुत्बा दिया। उन्होंने ज़ुल्म के ख़िलाफ़ बुलंद आवाज़ उठाई और यह पैग़ाम दिया कि हक़ को कभी भी ताक़त और ज़ुल्म के दम पर दबाया नहीं जा सकता।

Q3: हज़रत इमाम अली ज़ैनुल आबिदीन (रज़ियल्लाहु अन्हु) का करबला (Karbala) के बाद क्या किरदार रहा?
Ans: हज़रत इमाम अली ज़ैनुल आबिदीन (रज़ियल्लाहु अन्हु) करबला के वक़्त बीमारी की वजह से जंग में हिस्सा नहीं ले सके थे। बाद में उन्होंने अपनी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा इबादत, इल्म और लोगों तक करबला के पैग़ाम को पहुँचाने में गुज़ारा। उनकी कसरत-ए-सज्दों की वजह से उन्हें “सज्जाद (Sajjad)” के लक़ब से भी याद किया जाता है।

Q4: यज़ीद (Yazid) की मौत कैसे हुई और वह कितने साल जिया?
Ans: तारीखी रिवायतों के मुताबिक़, यज़ीद बिन मुआविया (Yazid ibn Muawiya) की मौत 64 हिजरी में हुई। उसकी मौत की वजह और उम्र के बारे में मुख़्तलिफ़ रिवायतें मिलती हैं। कई इतिहासकार उसकी उम्र लगभग 36 से 38 वर्ष बताते हैं, जबकि मौत की वजह के बारे में भी अलग-अलग बयान मौजूद हैं।

Q5: क्या यज़ीद (Yazid) ने अपनी ग़लती मानी थी?
Ans: इस बारे में तारीखी किताबों में अलग-अलग रिवायतें मिलती हैं। कुछ रिवायतों में आता है कि उसने उबैदुल्लाह इब्न ज़ियाद (Ubaidullah ibn Ziyad) पर ज़िम्मेदारी डालने की कोशिश की, जबकि दूसरे इतिहासकारों की राय अलग है। इसलिए किसी एक बात को निश्चित तौर पर कहना सही नहीं होगा।

ख़ुलासा: करबला का असल सबक

करबला के बाद क्या हुआ? (Karbala Ke Baad Kya Hua) की पूरी दास्तान हमें यह सिखाती है कि सिर्फ़ ताक़त, दौलत और बड़ी फ़ौज किसी की कामयाबी की ज़मानत नहीं होती। हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने अपने उसूलों, सब्र और दीन-ए-इस्लाम (Deen-e-Islam) की हिफ़ाज़त के लिए अपनी जान क़ुर्बान कर दी, लेकिन हक़ का रास्ता नहीं छोड़ा। यही वजह है कि सदियाँ गुज़र जाने के बाद भी उनका नाम दुनिया भर में इज़्ज़त, मोहब्बत और एहतराम के साथ लिया जाता है।

हम सबके लिए करबला का सबसे बड़ा पैग़ाम यही है कि हर हाल में हक़, इंसाफ़, सब्र और अल्लाह तआला पर भरोसा बनाए रखें। जब इंसान अपने उसूलों पर क़ायम रहता है, तो उसकी क़ुर्बानी कभी ज़ाया नहीं जाती।

अल्लाह तआला हम सबको हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) और अहले बैत (Ahl al-Bayt) की ज़िंदगी से इबरत हासिल करने, हक़ पर डटे रहने और अपनी ज़िंदगी क़ुरआन और सुन्नत के मुताबिक़ गुज़ारने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।

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Mohammad Naushad

अस्सलामु अलैकुम! मेरा नाम मौहम्मद नौशाद है और मैं Deen Ki Roshni का फ़ाउंडर हूँ। मैं क़ुरआन, सहीह हदीस और भरोसेमंद इस्लामी किताबों की रोशनी में आसान हिंदी में इस्लामी मालूमात आप तक पहुँचाने की कोशिश करता हूँ। अगर मेरे लिखे हुए लेखों से किसी एक इंसान को भी दीन की सही समझ हासिल हो जाए, तो मैं इसे अपने लिए अल्लाह की बड़ी नेमत समझता हूँ।

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