बैटल ऑफ़ करबला (Battle of Karbala) Part 2: 10 मुहर्रम का दर्दनाक वाक़िया

इस्लामी तारीख़ का जब सबसे अहम, दिल दहला देने वाला और रूह को छू लेने वाला सफ़हा खुलता है, तो हमारे सामने बैटल ऑफ़ करबला (Battle of Karbala) का मंज़र ताज़ा हो जाता है। यह कोई आम ज़मीन, दौलत या तख़्त की जंग नहीं थी, बल्कि यह हक़ और बातिल के बीच होने वाला ऐसा मुक़ाबला था, जिसमें एक तरफ़ सब्र, ईमान और दीन-ए-इस्लाम (Deen-e-Islam) की हिफ़ाज़त थी, तो दूसरी तरफ़ दुनिया की ताक़त और हुकूमत का घमंड।

अगर आपने इससे पहले हमारा करबला की कहानी Part 1 (Karbala Ki Kahani Part 1) पढ़ा है, तो आप जानते होंगे कि किस तरह हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) का क़ाफ़िला करबला (Karbala) की सरज़मीन तक पहुँचा था।

आइए, अब इस दर्दनाक दास्तान के अगले हिस्से को मशहूर तारीखी रिवायतों (Historical Narrations) के मुताबिक़ समझते हैं।

7 से 9 मुहर्रम : प्यास का इम्तिहान और आख़िरी रात

करबला (Karbala) के मैदान में 2 मुहर्रम को पहुँचने के बाद हालात लगातार मुश्किल होते गए। मशहूर तारीखी रिवायतों के मुताबिक़, यज़ीद (Yazid) की तरफ़ से नियुक्त गवर्नर उबैदुल्लाह इब्न ज़ियाद (Ubaidullah ibn Ziyad) के हुक्म पर 7 मुहर्रम को हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु), उनके अहले बैत और साथियों के लिए फ़ुरात (Euphrates River) से पानी लेने पर पाबंदी लगा दी गई। फ़ुरात का दरिया बिल्कुल क़रीब था, लेकिन उस पर सख़्त पहरा बिठा दिया गया था। तपते रेगिस्तान (Desert) की गर्मी, प्यास और बच्चों की बेचैनी दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थी।

जब 9 मुहर्रम की शाम हुई, तो दुश्मन की फ़ौज ने हमले की तैयारी शुरू कर दी। उस वक़्त हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने एक रात की मोहलत माँगी, ताकि वह अपने रब की इबादत कर सकें। यह रात इस्लामी तारीख़ में शब-ए-आशूरा (Shab-e-Ashura) के नाम से मशहूर है।

मशहूर रिवायतों के मुताबिक़, उस रात हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने अपने साथियों को जमा किया और फ़रमाया:

“मैं तुम सबको अपनी बैअत से आज़ाद करता हूँ। दुश्मनों का मक़सद सिर्फ़ मेरी जान है। अगर तुम चाहो, तो रात की तारीकी का फ़ायदा उठाकर यहाँ से चले जाओ।”

लेकिन रसूलुल्लाह ﷺ के उन वफ़ादार साथियों ने रोते हुए अर्ज़ किया कि: “अल्लाह की क़सम! हम आपको छोड़कर हरगिज़ वापस नहीं जाएँगे। अगर हमें बार-बार भी जान देनी पड़े, तब भी हम आपका साथ नहीं छोड़ेंगे।”

यही वह जज़्बा था जिसने बैटल ऑफ़ करबला (Battle of Karbala) को दुनिया की सबसे अनोखी और यादगार कुर्बानियों में शामिल कर दिया। इस मंज़र को पढ़कर या सुनकर आज भी हर मोहिब्ब-ए-अहले बैत (Lover of Ahl al-Bayt) की आँखें नम हो जाती हैं।

यौम-ए-आशूरा (Yaum-e-Ashura): 10 मुहर्रम की सुबह

फिर वह सुबह आ गई, जिसे इस्लामी तारीख़ का सबसे ग़मगीन दिन माना जाता है।

अगर आपने हमारा लेख आशूरा क्या है? (Ashura Kya Hai) पढ़ा है, तो आपको इस दिन की फ़ज़ीलत और अहमियत का अंदाज़ा होगा। 10 मुहर्रम की सुबह हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) के साथ लगभग 72 वफ़ादार साथी थे, जबकि दूसरी तरफ़ दुश्मन की फ़ौज हज़ारों की तादाद में मौजूद थी।

जब जंग शुरू हुई, तो हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) के साथी एक-एक करके मैदान में उतरते गए और बहादुरी के साथ लड़ते हुए शहीद होते गए।

इन्हीं में हज़रत हुर बिन यज़ीद (रज़ियल्लाहु अन्हु) भी शामिल थे, जो शुरुआत में दुश्मन की फ़ौज में थे। लेकिन जब उन्होंने हक़ (Truth) को पहचान लिया, तो तौबा करके हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) के क़ाफ़िले में शामिल हो गए और आख़िर तक उनका साथ निभाते हुए शहादत का जाम पिया।

शुहदा-ए-करबला (Shuhada-e-Karbala) की क़ुर्बानियाँ

बैटल ऑफ़ करबला (Battle of Karbala) का हर वाक़िया इंसान के दिल को ग़म से भर देता है। इस मैदान में अहले बैत (Ahl al-Bayt) और उनके वफ़ादार साथियों ने दीन-ए-इस्लाम (Deen-e-Islam) की हिफ़ाज़त के लिए ऐसी क़ुर्बानियाँ पेश कीं, जिन्हें दुनिया कभी भुला नहीं सकती।

मशहूर तारीखी रिवायतों के मुताबिक़, हज़रत अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु), जो हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) के भाई और इस क़ाफ़िले के अलमदार (Flag Bearer) थे, जब ख़ेमों में मौजूद प्यासे बच्चों के लिए फ़ुरात (Euphrates River) से पानी लाने पहुँचे, तो दुश्मनों ने उन्हें चारों तरफ़ से घेर लिया।

रिवायतों में आता है कि उनके दोनों बाज़ू काट दिए गए, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। आख़िरकार उन्हें शहीद कर दिया गया और वह बच्चों तक पानी नहीं पहुँचा सके। उनकी यह क़ुर्बानी आज भी वफ़ादारी, बहादुरी और ईसार की सबसे बड़ी मिसाल मानी जाती है। इसी तरह हज़रत अली अकबर (रज़ियल्लाहु अन्हु) और हज़रत अली असग़र (रज़ियल्लाहु अन्हु) की शहादत भी करबला के सबसे दर्दनाक मंज़रों में शामिल है।

मशहूर रिवायतों के मुताबिक़, हज़रत अली असग़र (रज़ियल्लाहु अन्हु) महज़ छह महीने के मासूम बच्चे थे। जब हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) उन्हें अपनी गोद में लेकर दुश्मन के सामने गए और उनके लिए पानी की गुज़ारिश की, तो जवाब में हुरमुला (Hurmula) नाम के एक तीरंदाज़ ने ऐसा तीर चलाया, जो उस मासूम बच्चे के गले पर लगा और वह शहीद हो गए।

उस वक़्त का मंज़र कितना दर्दनाक रहा होगा, इसका अंदाज़ा लगाना भी आसान नहीं है।

रसूलुल्लाह ﷺ ने हसन (रज़ियल्लाहु अन्हु) और हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) की फ़ज़ीलत बयान करते हुए फ़रमाया:

“हसन और हुसैन जन्नत के नौजवानों के सरदार हैं।”
(सुनन अत-तिर्मिज़ी, हदीस: 3768)

हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) की आख़िरी जंग और शहादत

Battle of Karbala- Imam Hussain (R.A) Ki Aakhiri Jung Aur Shahadat

जब एक-एक करके उनके तमाम साथी शहीद हो गए, तो आख़िर में हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) अकेले रह गए।मशहूर तारीखी रिवायतों के मुताबिक़, उन्होंने आख़िरी बार दुश्मन की फ़ौज को नसीहत की और उन्हें समझाया कि वे नाहक़ ख़ून बहाने से बाज़ आ जाएँ। लेकिन दुनिया की मोहब्बत, ताक़त और लालच ने उनके दिलों पर पर्दा डाल दिया था।

इसके बाद Hazrat Imam Hussain (R.A) ने अकेले ही बहादुरी के साथ दुश्मन का मुक़ाबला किया। उनके जिस्म-ए-मुबारक पर कई ज़ख़्म आए, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।

मशहूर रिवायतों के अनुसार, आख़िरकार उन्हें शहीद कर दिया गया। इस घटना को इस्लामी तारीख़ के सबसे दर्दनाक वाक़ियात में शुमार किया जाता है।

क़ुरआन-ए-पाक में अल्लाह तआला फ़रमाता है:

“और जो लोग अल्लाह की राह में क़त्ल किए जाएँ, उन्हें मुर्दा न कहो। बल्कि वे ज़िंदा हैं, लेकिन तुम्हें इसका एहसास नहीं।”
(सूरह अल-बक़रह, आयत: 154)

हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने अपनी जान क़ुर्बान कर दी, लेकिन हक़ (Truth) का साथ नहीं छोड़ा। उनकी यह अज़ीम क़ुर्बानी आज भी सब्र, इस्तिक़ामत और दीन-ए-इस्लाम (Deen-e-Islam) पर डटे रहने की सबसे बड़ी मिसाल मानी जाती है।

FAQs

Q1: बैटल ऑफ़ करबला (Battle of Karbala) कब और कहाँ हुई थी?
Ans: मशहूर तारीखी रिवायतों के मुताबिक़, बैटल ऑफ़ करबला (Battle of Karbala) 10 मुहर्रम 61 हिजरी (लगभग 10 अक्टूबर 680 ईस्वी) को इराक़ के करबला में फ़ुरात के क़रीब हुई थी।

Q2: करबला की जंग में हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) के साथ कितने लोग थे?
Ans: मशहूर रिवायतों के मुताबिक़, Imam Hussain (R.A) के साथ लगभग 72 वफ़ादार साथी थे। इनमें उनके अहले बैत (Ahl al-Bayt), छोटे बच्चे और उनके वफ़ादार साथी शामिल थे, जबकि दूसरी तरफ़ दुश्मन की फ़ौज हज़ारों की तादाद में मौजूद थी

Q3: Hazrat Ali Asghar कौन थे और उन्हें कैसे शहीद किया गया?
Ans: हज़रत अली असग़र (रज़ियल्लाहु अन्हु), हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) के सबसे छोटे बेटे थे। मशहूर तारीखी रिवायतों के मुताबिक़, जब उनके लिए पानी की गुज़ारिश की गई, तो हुरमुला (Hurmula) नाम के एक तीरंदाज़ ने उन पर तीर चलाया, जिससे वह शहीद हो गए।

Q4: हज़रत अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु) को ग़ाज़ी और सक़्क़ा क्यों कहा जाता है?
Ans: हज़रत अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु) करबला (Karbala) के क़ाफ़िले के अलमदार (Flag Bearer) थे। मशहूर रिवायतों के मुताबिक़, उन्होंने प्यासे बच्चों के लिए फ़ुरात (Euphrates River) से पानी लाने की कोशिश की और इसी बहादुरी, वफ़ादारी और ईसार की वजह से उन्हें ग़ाज़ी (Ghazi) और सक़्क़ा (Saqqa) के लक़ब से याद किया जाता है।

Q5: Imam Hussain (R.A) को किसने शहीद किया था?
Ans: मशहूर तारीखी रिवायतों के मुताबिक़, शिम्र बिन ज़िल-जौशन (Shimr ibn Dhi al-Jawshan) उन लोगों में शामिल था जिन्होंने हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) की शहादत में अहम किरदार निभाया। यह वाक़िया इस्लामी तारीख़ के सबसे दर्दनाक लम्हों में से एक माना जाता है।

ख़ुलासा: जंग का असल नतीजा (Conclusion)

ज़ाहिरी तौर पर दुश्मनों को लगा कि उन्होंने बैटल ऑफ़ करबला (Battle of Karbala) जीत ली है, लेकिन हक़ीक़त में फ़तह हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) के उसूलों की हुई। आज सदियाँ गुज़र जाने के बाद भी हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) का नाम दुनिया भर में इज़्ज़त, मोहब्बत और एहतराम के साथ लिया जाता है। उनकी ज़िंदगी हमें यह पैग़ाम देती है कि इंसान को हर हाल में हक़ का साथ देना चाहिए, चाहे उसके लिए कितनी ही बड़ी क़ुर्बानी क्यों न देनी पड़े।

हम सबको चाहिए कि हम हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) के सब्र, इस्तिक़ामत, अख़लाक़ और दीन-ए-इस्लाम (Deen-e-Islam) से मोहब्बत से सीख लें और अपनी ज़िंदगी को क़ुरआन और सुन्नत के मुताबिक़ गुज़ारने की कोशिश करें।

अल्लाह तआला हम सबको हक़ को पहचानने, उस पर डटे रहने और अपनी इबादत ख़ुलूस के साथ करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।

नोट (Note):
हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) की दर्दनाक शहादत के बाद अहले बैत (Ahl al-Bayt) के क़ैदियों के साथ क्या हुआ? यज़ीद (Yazid) का अंजाम क्या हुआ? और इस वाक़िये के बाद इस्लामी तारीख़ ने कौन-सा नया मोड़ लिया? यह सब जानने के लिए हमारी इस सीरीज़ (Series) का आख़िरी लेख करबला के बाद क्या हुआ? Part 3 (Karbala Ke Baad Kya Hua Part 3) ज़रूर पढ़ें।

Mohammad Naushad

अस्सलामु अलैकुम! मेरा नाम मौहम्मद नौशाद है और मैं Deen Ki Roshni का फ़ाउंडर हूँ। मैं क़ुरआन, सहीह हदीस और भरोसेमंद इस्लामी किताबों की रोशनी में आसान हिंदी में इस्लामी मालूमात आप तक पहुँचाने की कोशिश करता हूँ। अगर मेरे लिखे हुए लेखों से किसी एक इंसान को भी दीन की सही समझ हासिल हो जाए, तो मैं इसे अपने लिए अल्लाह की बड़ी नेमत समझता हूँ।

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