करबला की कहानी (Karbala Ki Kahani) Part 1: करबला से पहले की चौंका देने वाली सच्चाई

इस्लामी तारीख़ में करबला की कहानी (Karbala Ki Kahani) कोई एक आम वाक़िया नहीं है, बल्कि यह हक़, सब्र और दीन-ए-इस्लाम (Deen-e-Islam) को ज़िंदा रखने की ऐसी जिंदा मिसाल है, जो क़यामत तक के लिए अमर (Immortal) हो चुकी है। हर साल जब भी मुहर्रम (Muharram) का चाँद नज़र आता है, तो हर इंसान का दिल ग़म से भर जाता है।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि मैदान-ए-करबला में उस आख़िरी जंग से पहले क्या हुआ था? आख़िर हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) को मदीना क्यों छोड़ना पड़ा और बात करबला तक कैसे पहुँची?

आइए, इस लेख के ज़रिए हम करबला की कहानी (Karbala Ki Kahani) के उस हिस्से को समझते हैं, जो इस पूरे वाक़िये की बुनियादी पृष्ठभूमि है।

करबला की कहानी का शुरुआती बैकग्राउंड

दीन-ए-इस्लाम में इस दर्द भरे वाक़िये की शुरुआत 60 हिजरी में होती है। उस समय के हालात को समझने के लिए सबसे पहले यह जानना ज़रूरी है कि यज़ीद कौन था (Yazid kaun tha) और उसका हुकूमत करने का तरीका क्या था।

हज़रत मुआविया (रज़ियल्लाहु अन्हु) के इंतिकाल के बाद उनका बेटा यज़ीद दमिश्क के तख़्त पर बैठा। इसके बाद उससे अपनी हुकूमत के लिए लोगों से बैअत यानी वफ़ादारी का वादा लेने की कोशिश की गई।

तख़्त पर बैठते ही यज़ीद ने पूरे मुल्क से अपनी बैअत माँगनी शुरू कर दी। उसका सबसे ज़्यादा ज़ोर इस बात पर था कि किसी भी तरह हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) उसकी हुकूमत को स्वीकार कर लें, क्योंकि वह जानता था कि नबी-ए-करीम ﷺ के नवासे का फ़ैसला मुसलमानों के लिए बहुत अहमियत रखता था।

हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) का बैअत से इंकार और मदीना छोड़ना

करबला की कहानी (Karbala Ki Kahani) का सबसे अहम मोड़ Hazrat Imam Husaain (R.A) का बैअत से इंकार था।

Hazrat Imam Husaain (R.A) अच्छी तरह जानते थे कि उस समय के हालात बेहद नाज़ुक थे। यदि वे यज़ीद की बैअत स्वीकार कर लेते, तो आने वाली नस्लें बहुत-सी बातों को दीन-ए-इस्लाम की सही तालीम समझ सकती थीं। इसी वजह से उन्होंने अपने उसूलों पर समझौता नहीं किया।

क़ुरआन-ए-पाक में अल्लाह तआला फ़रमाता है:

“और तुममें एक जमाअत ऐसी होनी चाहिए जो भलाई की तरफ़ बुलाए, नेकी का हुक्म दे और बुराई से रोके। यही लोग कामयाब होने वाले हैं।” (सूरह आले इमरान, आयत 104)

इसी हुक्म पर अमल करते हुए हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने यज़ीद की बैअत स्वीकार नहीं की। जब हालात ज़्यादा मुश्किल होने लगे और उन पर दबाव बढ़ने लगा, तब उन्होंने अपने ख़ानदान की सलामती के लिए अपना प्यारा वतन मदीना छोड़ा और मक्का तशरीफ़ ले आए।

कूफ़ा के लोगों के ख़त और हज़रत मुस्लिम बिन अकील (रज़ियल्लाहु अन्हु) का सफ़र

जब इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) मक्का पहुँच गए, तब इराक़ के शहर कूफ़ा के लोगों को इसकी मालूमात मिली। उस समय कूफ़ा के बहुत-से लोग यज़ीद की हुकूमत से नाखुश थे। उन्होंने बड़ी संख्या में हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) को ख़त लिखे, जिनमें लिखा था:

“आप हमारे इमाम हैं। आप कूफ़ा आइए, हम आपका साथ देंगे और आपके हाथ पर बैअत करेंगे।”

कूफ़ा के लोगों की स्थिति और उनकी नीयत का सही अंदाज़ा लगाने के लिए Hazrat Imam Hussain (R.A) ने अपने चचाज़ाद भाई हज़रत मुस्लिम बिन अकील (रज़ियल्लाहु अन्हु) को कूफ़ा भेजा।

शुरुआत में कूफ़ा के हज़ारों लोगों ने हज़रत मुस्लिम बिन अकील (रज़ियल्लाहु अन्हु) के हाथ पर बैअत की। हालात अनुकूल दिखाई देने पर उन्होंने हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) को ख़त भेजकर लिखा कि हालात ठीक हैं और आप कूफ़ा आ सकते हैं।

लेकिन इसी दौरान यज़ीद ने कूफ़ा का गवर्नर बदल दिया और वहाँ उबैदुल्लाह इब्न ज़ियाद (Ubaidullah ibn Ziyad) को नियुक्त कर दिया। उसके पहुँचते ही कूफ़ा के लोगों पर दबाव बढ़ाया गया। उन्हें डराया गया, लालच दिया गया और सख़्ती की गई। नतीजा यह हुआ कि जो लोग कल तक हज़रत मुस्लिम बिन अकील (रज़ियल्लाहु अन्हु) के साथ खड़े थे, वे डर के वजह उनका साथ छोड़ने लगे।

कुछ समय बाद हज़रत मुस्लिम बिन अकील (रज़ियल्लाहु अन्हु) को कूफ़ा में शहीद कर दिया गया। हालांकि उनकी शहादत की ख़बर हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) तक देर से पहुँची।

मक्का से करबला का दर्दनाक सफ़र

कूफ़ा से पूरी मालूमात मिलने से पहले ही हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) Makkah से अपना सफ़र शुरू कर चुके थे। उनके साथ उनका पूरा ख़ानदान, छोटे बच्चे और कुछ वफ़ादार साथी भी थे। सफ़र के दौरान उन्हें यह ख़बर मिली कि हज़रत मुस्लिम बिन अकील (रज़ियल्लाहु अन्हु) शहीद कर दिए गए हैं और कूफ़ा के लोग अपने वादे से पीछे हट चुके हैं।

इस कठिन घड़ी में भी हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने अपने साथियों से फ़रमाया कि जो व्यक्ति वापस लौटना चाहता है, वह लौट जाए, क्योंकि आगे का रास्ता बेहद कठिन है। लेकिन उनके सच्चे साथी और अहले बैत (Ahl al-Bayt) उन्हें छोड़कर नहीं गए।

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

“हुसैन मुझसे है और मैं हुसैन से हूँ। अल्लाह उससे मोहब्बत करता है जो हुसैन से मोहब्बत करता है।” (सुनन अत-तिर्मिज़ी, हदीस: 3775)

Deen-e-Islam की इसी मोहब्बत और हक़ पर डटे रहने के जज़्बे के साथ यह छोटा-सा काफ़िला आगे बढ़ता रहा। आख़िरकार 2 मुहर्रम 61 हिजरी को यह काफ़िला उस जगह पहुँचा, जिसे आज पूरी दुनिया करबला के नाम से जानती है।

करबला में आमद और पानी की पाबंदी

जैसे ही हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) का काफ़िला करबला की ज़मीन पर पहुँचा, वहाँ हुर बिन यज़ीद (Hur bin Yazid) के क़ियादत में मौजूद एक दस्ते ने उनका रास्ता रोक लिया। इसके बाद हज़रत हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने वहीं अपना खेमा (Camp) लगाने का फ़ैसला किया।

कुछ ही दिनों में यज़ीद की ओर से एक बड़ी फ़ौज, जिसकी कमान उमर बिन सअद (Umar ibn Sa’d) के हाथ में थी, वहाँ पहुँच गई।

ऐतिहासिक रिवायतों के अनुसार, 7 मुहर्रम को यज़ीद के गवर्नर के आदेश पर फ़ुरात (Euphrates River) से पानी लेने पर पाबंदी लगा दी गई। इसके बाद हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु), उनके अहले बैत (Ahl al-Bayt), छोटे बच्चों और साथियों को अत्यंत कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।

यहीं से करबला की कहानी (Karbala Ki Kahani) एक ऐसे मोड़ पर पहुँचती है, जहाँ सब्र, ईमान और कुर्बानी की सबसे बड़ी मिसाल सामने आती है। आगे चलकर यही वाक़िया 10 मुहर्रम (आशूरा – Ashura) के दिन इतिहास के सबसे दर्दनाक वाक़ियों में शामिल हो गईं।

इस Series के अगले भाग में हम करबला की कहानी Part 2 (Karbala Ki Kahani Part 2) में विस्तार से जानेंगे कि आशूरा (Ashura) के दिन क्या हुआ, हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) और उनके साथियों ने किस तरह दीन-ए-इस्लाम (Deen-e-Islam) की हिफ़ाज़त के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी, और इस महान क़ुर्बानी से पूरी उम्मत को क्या सीख मिलती है।

FAQs

Q1: करबला की कहानी (Karbala Ki Kahani) असल में क्या है?
Ans: करबला की कहानी (Karbala Ki Kahani) हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) और यज़ीद के दौर में पेश आए उन तारीखी घटनाक्रमों का वर्णन है, जिन्हें इस्लामी तारीख़ में हक़, सब्र और दीन-ए-इस्लाम (Deen-e-Islam) के उसूलों पर डटे रहने की महान मिसाल माना जाता है।

Q2: हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) मदीना छोड़कर कूफ़ा क्यों जा रहे थे?
Ans: कूफ़ा के बहुत-से लोगों ने उन्हें ख़त लिखकर वहाँ आने का आग्रह किया था और उनका साथ देने का वादा किया था। इन्हीं परिस्थितियों के बीच उन्होंने कूफ़ा की ओर सफ़र शुरू किया।

Q3: हज़रत मुस्लिम बिन अकील (रज़ियल्लाहु अन्हु) कौन थे और उनका करबला से क्या संबंध है?
Ans: हज़रत मुस्लिम बिन अकील (रज़ियल्लाहु अन्हु), हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) के चचाज़ाद भाई थे। उन्हें कूफ़ा (Kufa) के हालात का जायज़ा लेने के लिए भेजा गया था, जहाँ बाद में उन्हें शहीद कर दिया गया। उनकी शहादत, करबला के वाक़िये से पहले की सबसे अहम घटनाओं में से एक मानी जाती है।

Q4: हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) करबला कब पहुँचे थे?
Ans: मशहूर तारीखी रिवायतों के अनुसार, हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) अपने परिवार और साथियों के साथ 2 मुहर्रम 61 हिजरी को करबला पहुँचे थे।

Q5: करबला में पानी कब बंद किया गया था?
Ans: मशहूर ऐतिहासिक रिवायतों के अनुसार, 7 मुहर्रम को फ़ुरात (Euphrates River) से पानी लेने पर पाबंदी लगा दी गई थी, जिसके बाद हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु), उनके ख़ानदान और साथियों को अत्यंत कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।

ख़ुलासा: Part 1 का सबक (Conclusion)

करबला की कहानी (Karbala Ki Kahani) का यह पहला भाग हमें सिखाता है कि हक़ के रास्ते पर चलना हमेशा आसान नहीं होता। कई बार इसके लिए बड़ी से बड़ी कुर्बानी (Qurbani), सब्र और अटल ईमान की ज़रूरत होती है।

हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने उसूलों पर समझौता नहीं किया। यही वजह है कि उनका नाम आज भी हक़, सब्र और दीन-ए-इस्लाम (Deen-e-Islam) की हिफ़ाज़त की सबसे महान मिसालों में लिया जाता है।

इंशाअल्लाह, इस Series के अगले भाग में हम करबला की कहानी Part 2 (Karbala Ki Kahani Part 2) में 10 मुहर्रम (आशूरा – Ashura) के दिन की घटनाओं और उससे मिलने वाली अहम सीख को विस्तार से समझेंगे।

Mohammad Naushad

अस्सलामु अलैकुम! मेरा नाम मौहम्मद नौशाद है और मैं Deen Ki Roshni का फ़ाउंडर हूँ। मैं क़ुरआन, सहीह हदीस और भरोसेमंद इस्लामी किताबों की रोशनी में आसान हिंदी में इस्लामी मालूमात आप तक पहुँचाने की कोशिश करता हूँ। अगर मेरे लिखे हुए लेखों से किसी एक इंसान को भी दीन की सही समझ हासिल हो जाए, तो मैं इसे अपने लिए अल्लाह की बड़ी नेमत समझता हूँ।

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