परिचय
जब भी इस्लामी साल की पहली तारीख़ आती है, तो लोगों के दिलों में सब्र, कुर्बानी और हक़ का ज़िक्र ताज़ा हो जाता है। ज़ेहन में फ़ौरन मुहर्रम (Muharram) और कर्बला (Karbala) के शुहदा के नाम गूंजने लगते हैं।
लेकिन इस पूरे वाक़िये को सही तरह से समझने के लिए एक सवाल का जवाब जानना बहुत ज़रूरी है कि आखिर यज़ीद कौन था? (Yazid Kaun Tha?) वह कौन था जिसके फ़ैसलों ने तारीख़ का रुख़ बदल दिया और जिसके दौर में इस्लामी इतिहास का सबसे दर्दनाक वाक़िया पेश आया?
आइए, इस लेख के ज़रिए हम बिल्कुल आसान और आम भाषा में यज़ीद बिन मुआविया (Yazid bin Muawiya) (जिसे कुछ लोग यज़ीद (Yazeed) भी लिखते हैं) की हक़ीक़त को समझते हैं।
यज़ीद कौन था? (Yazid Kaun Tha?)
इंटरनेट पर बहुत से लोग “यज़ीद कौन था? (Yazeed Kaun Tha?)” या “यजीद कौन था? (Yajeed Kaun Tha?)” भी सर्च करते हैं, लेकिन यह सभी एक ही ऐतिहासिक शख़्सियत यज़ीद बिन मुआविया (Yazid bin Muawiya) की तरफ़ इशारा करते हैं।

यज़ीद बिन मुआविया (Yazid bin Muawiya), बनू उमय्या (Banu Umayya) यानी उमय्यद सल्तनत (Umayyad Dynasty) का दूसरा शासक था। उसका जन्म लगभग 26 हिजरी (647 ईस्वी) में शाम (Syria) में हुआ था। वह हज़रत मुआविया (रज़ियल्लाहु अन्हु) का बेटा था।
यज़ीद का दौर-ए-हुकूमत इस्लामी इतिहास का एक बेहद अहम मोड़ माना जाता है, क्योंकि इसी दौर में इस्लामी हुकूमत का निज़ाम ख़िलाफ़त से बादशाहत की ओर बदलने लगा था।
यज़ीद का बचपन और उसकी शख्सियत
यज़ीद (Yazid) का बचपन शाम (वर्तमान सीरिया) के माहौल में गुज़रा था। बचपन से ही उसने घुड़सवारी, शिकार और तीरंदाज़ी जैसी कलाएँ सीख ली थीं।
जब हम इतिहास का अध्ययन करते हैं, तो पता चलता है कि यज़ीद की दिलचस्पी ज़्यादातर हुकूमत और दुनियावी ज़िंदगी में थी। बहुत से इतिहासकार लिखते हैं कि वह सियासत और प्रशासनिक मामलों पर बहुत अधिक ध्यान देता था।
जबकि दीन-ए-इस्लाम में इल्म और इबादत से उसकी दिलचस्पी उतनी मशहूर नहीं थी।.
ख़िलाफ़त से बादशाहत तक का सफ़र: यज़ीद का तख़्त पर बैठना
जब हज़रत मुआविया (रज़ियल्लाहु अन्हु) का आख़िरी दौर चल रहा था, तब उन्होंने यज़ीद (Yazid) को अपना उत्तराधिकारी (जानशीन) मुक़र्रर कर दिया था।
यह दीन-ए-इस्लाम के इतिहास में एक बहुत बड़ा बदलाव था, क्योंकि इससे पहले ख़लीफ़ाओं का चयन आम मशवरे (शूरा) के ज़रिए किया जाता था।
जब 60 हिजरी में हज़रत मुआविया (रज़ियल्लाहु अन्हु) का इंतिक़ाल हुआ, तब यज़ीद (Yazid) हुक्मरान बना और उसने दमिश्क (Damascus) से अपनी हुकूमत शुरू की।
हुकूमत संभालते ही उसने मदीना के गवर्नर को संदेश भेजा कि वहाँ मौजूद सभी बड़ी और सम्मानित हस्तियों से उसकी बैअत (Bay’ah) यानी वफ़ादारी की शपथ ली जाए।
इन बुज़ुर्ग हस्तियों में सबसे अहम नाम हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) का था, क्योंकि वे नबी मुहम्मद ﷺ के नवासे थे और मुसलमानों के बीच उनका बहुत ऊँचा सम्मान था।
हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने बैअत (Bay’at) से इनकार क्यों किया?
यही इस कहानी का सबसे अहम मोड़ है।
यज़ीद कौन था? (Yazid Kaun Tha?) इसका अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि उसका हुकूमत करने का तरीका दीन-ए-इस्लाम की मूल शिक्षाओं से मेल नहीं खा रहा था, क्योंकि अब ख़िलाफ़त (Khilafat) धीरे-धीरे बादशाहत (Monarchy) में बदल चुकी थी, जहाँ लोगों के बीच हक़ और दीन की परवाह कम होती जा रही थी।
हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) को महसूस होने लगा था कि अगर सभी लोग यज़ीद जैसे शख़्स की बादशाहत को स्वीकार कर लेंगे, तो इस्लाम का असली चेहरा हमेशा के लिए बदल जाएगा।
इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) का इनकार किसी व्यक्तिगत दुश्मनी की वजह से नहीं था, बल्कि हक़, इंसाफ़ और दीन की हिफ़ाज़त के लिए था।
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आपके इनकार के बाद हालात लगातार बिगड़ते गए और कूफ़ा (Kufa) के लोगों के बुलावे पर हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने अपना सफ़र शुरू किया।
यज़ीद और कर्बला का वाक़िया
यज़ीद (Yazid) के दौर का सबसे स्याह और दर्दनाक पन्ना यौम-ए-आशूरा (Yaum-e-Ashura) यानी 10 मुहर्रम (10 Muharram) के दिन लिखा गया।
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यज़ीद (Yazid) द्वारा नियुक्त गवर्नर उबैदुल्लाह इब्न ज़ियाद (Ubaidullah ibn Ziyad) और उसकी फ़ौज ने हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) तथा उनके छोटे से काफ़िले को कर्बला (Karbala) में घेर लिया।
उन पर फ़ुरात (Euphrates) का पानी बंद कर दिया गया और आख़िरकार मैदान-ए-कर्बला (Karbala) में उन्हें और उनके साथियों को बड़ी बेरहमी के साथ शहीद कर दिया गया।
हालाँकि बाद में यज़ीद (Yazid) ने लोगों के सामने यह दिखाने की कोशिश की कि वह इस क़त्ल से खुश नहीं था, लेकिन इतिहास इस बात का गवाह है कि उसने इस घटना के ज़िम्मेदार लोगों को कोई सख़्त सज़ा नहीं दी। इसी वजह से इस्लामी इतिहास में बहुत से विद्वान और इतिहासकार उसे इस घटना की राजनीतिक और प्रशासनिक ज़िम्मेदारी से अलग नहीं मानते।
इस्लामी इतिहास (Islamic History) और विद्वानों का यज़ीद के बारे में क्या मत है?
सऊदी अरब (Saudi Arabia) और दुनिया के कई प्रमुख सुन्नी विद्वानों (Sunni Scholars), जैसे इब्न तैमिय्या (Ibn Taymiyyah), का मत यह है कि यज़ीद न तो कोई आदर्श व्यक्ति था और न ही ऐसा शासक जिसे मुसलमानों के लिए अनुकरणीय माना जाए।
वे उसे एक ऐसा शासक मानते हैं जिसके दौर में अहल-ए-बैत (Ahl al-Bayt) पर अत्यंत बड़ा अत्याचार हुआ। इसी कारण मुसलमान उसके उस दौर की घटनाओं की निंदा करते हैं और कर्बला (Karbala) के वाक़िये को इस्लामी इतिहास का अत्यंत दुखद अध्याय मानते हैं।
नोट: यज़ीद के बारे में इस्लामी विद्वानों के बीच अलग-अलग ऐतिहासिक मत पाए जाते हैं। इसलिए इस विषय को समझते समय विश्वसनीय इस्लामी और ऐतिहासिक स्रोतों का अध्ययन करना उचित है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Q1: यज़ीद कौन था? (Yazid Kaun Tha?) और उसका पिता कौन था?
Ans: यज़ीद बिन मुआविया (Yazid bin Muawiya) उमय्यद सल्तनत (Umayyad Dynasty) का दूसरा शासक था। उसके पिता हज़रत मुआविया (रज़ियल्लाहु अन्हु) थे, जिन्हें उमय्यद दौर का पहला शासक माना जाता है।
Q2: क्या यज़ीद (Yazid) ने इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) को शहीद करवाया था?
Ans: प्रत्यक्ष रूप से उसने स्वयं यह कार्य नहीं किया, लेकिन उसके नियुक्त गवर्नर उबैदुल्लाह इब्न ज़ियाद (Ubaidullah ibn Ziyad) और उसकी सेना ने कर्बला (Karbala) में हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) और उनके साथियों को शहीद किया। चूँकि उस समय यज़ीद (Yazid) शासक था, इसलिए इस पूरे वाक़िये की राजनीतिक ज़िम्मेदारी उसी के दौर की मानी जाती है।
Q3: क्या सऊदी अरब में लोग यज़ीद को मानते हैं?
Ans: नहीं। सऊदी अरब (Saudi Arabia) के आम लोग और वहाँ के अधिकांश विद्वान यज़ीद (Yazid) को अपना आदर्श या धार्मिक नेता नहीं मानते। वे अहल-ए-बैत (Ahl al-Bayt) से मोहब्बत करते हैं और कर्बला (Karbala) के वाक़िये को इस्लामी इतिहास का अत्यंत दर्दनाक सबक मानते हैं।
Q4: ख़िलाफ़त और बादशाहत में क्या फ़र्क़ है, जो यज़ीद के दौर में शुरू हुआ?
Ans: ख़िलाफ़त में शासक का चयन आम मशवरे (शूरा) और इस्लामी उसूलों के अनुसार किया जाता था, जबकि बादशाहत में सत्ता वंशानुगत हो जाती है, यानी पिता के बाद बेटा बिना आम मशवरे के तख़्त पर बैठ जाता है। इतिहासकारों के अनुसार, यज़ीद के दौर में इस बदलाव ने इस्लामी शासन व्यवस्था में एक नया मोड़ पैदा किया।
Q5: यज़ीद की मौत कैसे हुई और उसकी क़ब्र कहाँ है?
Ans: यज़ीद (Yazid) की मृत्यु लगभग 64 हिजरी (683 ईस्वी) में लगभग 36–37 वर्ष की आयु में हुई थी। उसकी मृत्यु के बारे में अलग-अलग ऐतिहासिक रिवायतें मिलती हैं। कुछ इतिहासकार बीमारी का उल्लेख करते हैं, जबकि कुछ शिकार के दौरान हुए हादसे का ज़िक्र करते हैं।
उसका इंतिक़ाल हुवारीन (Huwwarin, Syria) में हुआ था। ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार उसे दमिश्क (Damascus) के आसपास दफ़न किया गया, लेकिन आज उसकी क़ब्र के बारे में निश्चित और सर्वसम्मत जानकारी उपलब्ध नहीं है।
Q6: यज़ीद ने कितने साल हुकूमत की?
Ans: यज़ीद का दौर-ए-हुकूमत बहुत छोटा था। उसने लगभग 3 साल और कुछ महीनों तक (60 हिजरी से 64 हिजरी) शासन किया। लेकिन इसी छोटे से दौर में इस्लामी इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाएँ पेश आईं।
Q7: यज़ीद के दौर में कर्बला के अलावा और कौन-से बड़े वाक़िये हुए?
Ans:यज़ीद (Yazid) के लगभग तीन साल के शासनकाल में तीन बड़े और दुखद ऐतिहासिक वाक़िये हुए—
वाक़िया-ए-कर्बला (Waqia-e-Karbala): हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) और उनके साथियों की शहादत।
वाक़िया-ए-हर्रह (Waqia-e-Harrah): जहाँ यज़ीद की फ़ौज ने मदीना मुनव्वरा पर हमला किया।
मक्का मुकर्रमा (Makkah Mukarramah) का घेराव: जब हज़रत अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने बैअत से इनकार किया, तब मक्का का घेराव किया गया और ख़ाना-ए-काबा (Kaaba) को भी नुकसान पहुँचा।
Q8: यज़ीद के बाद तख़्त पर कौन बैठा?
Ans: यज़ीद (Yazid) की मृत्यु के बाद उसका बेटा मुआविया द्वितीय (Muawiya II / Muawiya bin Yazid) तख़्त पर बैठा। इतिहास में उनका उल्लेख एक नरमदिल और परहेज़गार व्यक्ति के रूप में मिलता है।
उन्होंने केवल कुछ महीनों तक शासन किया। कुछ ऐतिहासिक रिवायतों में यह भी उल्लेख मिलता है कि उन्होंने शासन से अलग होने की इच्छा व्यक्त की थी। हालांकि, इस संबंध में विभिन्न ऐतिहासिक मत पाए जाते हैं।
Q9: यज़ीद (Yazid) का नसब (Family Tree) क्या था?
Ans: यज़ीद का पूरा नाम यज़ीद बिन मुआविया बिन अबू सुफ़यान (Yazid bin Muawiya bin Abu Sufyan) था। उसका संबंध बनू उमय्या (Banu Umayya) से था, जो मक्का का एक प्रसिद्ध और प्रभावशाली क़बीला माना जाता था।
Q10. क्या Yazid, Yazeed और Yajeed अलग-अलग लोग हैं?
Ans: नहीं। Yazid, Yazeed और Yajeed एक ही ऐतिहासिक शख़्सियत के अलग-अलग Roman spellings हैं। अरबी नाम “Yazid bin Muawiya” को लोग अपनी भाषा और लिखने के अंदाज़ के अनुसार अलग-अलग तरीक़ों से लिखते हैं।
निष्कर्ष: यज़ीद के दौर से हमें क्या सबक मिलता है?
यज़ीद कौन था? (Yazid Kaun Tha?) इस सवाल का सार यही है कि वह ऐसी हुकूमत चाहता था जहाँ सभी लोग उसके सामने सिर झुकाएँ, उसकी बैअत करें और उसकी सत्ता को बिना सवाल स्वीकार कर लें। उसके दौर की घटनाएँ बताती हैं कि सत्ता और ताक़त का दुरुपयोग समाज को किस दिशा में ले जा सकता है।
दूसरी ओर, हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) का नाम हमेशा के लिए सब्र, हक़, इंसाफ़ और दीन की हिफ़ाज़त की पहचान बन गया। कर्बला (Karbala) का पैग़ाम आज भी पूरी इंसानियत को यह सिखाता है कि सच्चाई और न्याय के लिए डटे रहना ही असली कामयाबी है, चाहे उसके लिए कितनी भी बड़ी कुर्बानी क्यों न देनी पड़े।






