TODAY'S DATE Loading... India
NEXT PRAYER Loading...

जब दुआ क़ुबूल न हो तो क्या समझें? इस्लाम क्या सिखाता है

हर मुसलमान की ज़िंदगी में कभी न कभी एक ऐसा दिन या वक़्त ज़रूर आता है जब वो दिल से, रो-रोकर अल्लाह से कोई दुआ मांगता है, लेकिन ज़ाहिरी तौर पर उसे लगता है कि कुछ बदल नहीं रहा। उस वक़्त दिल में कई सवाल उठते हैं , जब दुआ क़ुबूल न हो तो क्या समझें? क्या अल्लाह ने मेरी दुआ नहीं सुनी? क्या मुझसे कोई ऐसी ग़लती हुई है जिसकी वजह से मेरी पुकार रद्द कर दी जा रही है?

कभी दुआ फ़ौरन क़ुबूल होती नज़र आती है, और कभी इसमें बहुत देर हो जाती है। इंसान फ़ितरी तौर पर जल्दबाज़ है, इसलिए वो मायूस होने लगता है। लेकिन इस्लाम इस सवाल का जो जवाब देता है, वो इंसानी अक़्ल को हैरान कर देता है और दिल को सुकून से भर देता है। क़ुरान और सुन्नत की रोशनी में इस मौज़ू को गहराई से समझना ज़रूरी है ताकि हम समझ सकें कि इस्लाम में दुआ की अहमियत क्या है और अल्लाह का अपने बंदे के साथ क्या मामला रहता है।

क्या अल्लाह हर दुआ सुनता है?

इसका सीधा और साफ़ जवाब है, हां, अल्लाह हर एक दुआ सुनता है। अल्लाह तआला “अस-समी” (सब कुछ सुनने वाला) और “अल-मुजीब” (दुआ क़ुबूल करने वाला) है। क़ुरान-ए-करीम में अल्लाह ने वाज़ेह तौर पर फ़रमाया है कि जब भी कोई बंदा उसे पुकारता है, वो उसके बहुत ही क़रीब होता है।

अल्लाह तआला कुरान सूरह अल-बक़रह में फ़रमाता है –

“وَإِذَا سَأَلَكَ عِبَادِي عَنِّي فَإِنِّي قَرِيبٌ ۖ أُجِيبُ دَعْوَةَ الدَّاعِ إِذَا دَعَانِ”

तर्जुमा: “और जब मेरे बंदे आपसे मेरे बारे में सवाल करें, तो (आप कह दें कि) बिल्कुल मैं तो क़रीब हूं। जब भी कोई पुकारने वाला मुझे पुकारता है, मैं उसकी पुकार को क़ुबूल करता हूं।” (सूरह अल-बक़रह, आयत: 186)

इस आयत की वज़ाहत जानो

इस पाक आयत से साफ़ मालूम होता है कि अल्लाह अपने बंदों की दुआओं से बेख़बर नहीं है। अल्लाह ने फ़रमाया कि “मैं क़रीब हूं” और पुकारने वाले की पुकार का जवाब देता हूं। जब हम क़ुरान में दुआ के इस बात को देखते हैं, तो हमें यक़ीन होता है कि हमारी पुकार ज़ाया नहीं जाती। अगर आपको लग रहा है कि जवाब नहीं आया, तो इसका मतलब यह नहीं कि अल्लाह ने आपकी पुकार सुनी ही नहीं।

दुआ क़ुबूल होने का मतलब हमेशा वही चीज़ मिलना नहीं होता

हमारी सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी यह होती है कि हम समझते हैं दुआ क़ुबूल होने का मतलब सिर्फ़ वही है जो हमने मांगा, बस वही मिल जाए। मगर रसूलुल्लाह ﷺ ने हमें सिखाया कि दुआ के मामले में बंदे को जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए और अल्लाह के जवाब का इंतज़ार करते हुए दुआ हमेशा जारी रखनी चाहिए।

हज़रत अबू सईद अल-ख़ुदरी रज़ि. से रिवायत की जाने वाली एक मशहूर हदीस में दुआ के जवाब की मुख़्तलिफ़ सूरतों का ज़िक्र मिलता है। इस रिवायत के मुताबिक़, ऐसी दुआ जिसमें गुनाह या क़ता-ए-रहमी की बात न हो, उसके बदले बंदे को दुआ का जवाब मिलता है, कोई मुसीबत दूर की जाती है या उसका अज्र आख़िरत के लिए रखा जाता है।

दुआ क़ुबूल होने की तीन सूरतें

  • फ़ौरन मिल जाना – जो आपने मांगा, वो आपको उसी वक़्त या थोड़े वक़्त बाद मिल गया।
  • मुसीबत का टल जाना – आपने कोई चीज़ मांगी, मगर अल्लाह ने उसके बदले आप पर आने वाली किसी बड़ी बीमारी, हादसे या परेशानी को दूर कर दिया।
  • आख़िरत का ख़ज़ाना – जो दुआ दुनिया में आपकी चाहत के मुताबिक़ पूरी नहीं हुई, उसका अज्र आख़िरत के लिए रखा जा सकता है।

इसलिए सिर्फ़ इस आधार पर कि हमें अपनी मांगी हुई चीज़ नज़र नहीं आई, यह फैसला नहीं करना चाहिए कि दुआ बेकार चली गई।

दुआ में देर क्यों हो सकती है (अल्लाह की हिकमत)

इंसान की मस्लिहत और अल्लाह का इल्म – हम बहुत सी चीज़ों को अपने लिए बेहतर समझते हैं जो हक़ीक़त में हमारे लिए नुक़सानदेह हो सकती हैं। अल्लाह हमारे मुस्तक़बिल को जानता है।

सूरह अल-बक़रह में इरशाद है –

“وَعَسَىٰ أَن تَكْرَهُوا شَيْئًا وَهُوَ خَيْرٌ لَّكُمْ ۖ وَعَسَىٰ أَن تُحِبُّوا شَيْئًا وَهُوَ شَرٌّ لَّكُمْ ۗ وَاللَّهُ يَعْلَمُ وَأَنتُمْ لَا تَعْلَمُونَ”

तर्जुमा: “और यह मुमकिन है कि तुम किसी चीज़ को नापसंद करो और वो तुम्हारे लिए बेहतर हो, और यह भी मुमकिन है कि तुम किसी चीज़ को पसंद करो और वो तुम्हारे लिए बुरी हो। और अल्लाह जानता है, तुम नहीं जानते।” (सूरह अल-बक़रह, आयत: 216)

बेहतर वक़्त का इंतिख़ाब – अल्लाह की हिकमत हमारी समझ से बहुत बुलंद है। कोई चीज़ हमें अभी चाहिए हो सकती है, लेकिन हम यह नहीं जानते कि उसके लिए कौन सा वक़्त और कौन सा अंजाम हमारे हक़ में बेहतर है। इसलिए दुआ में देर को फ़ौरन इनकार समझ लेना सही नहीं।

इम्तिहान और सब्र की तरबियत – अल्लाह अपने बंदों को आज़माता है और सब्र करने वालों के लिए अज्र का वादा किया गया है। दुआ और सब्र का तअल्लुक़ बहुत गहरा है। जब आप सब्र करते हैं और दुआ जारी रखते हैं, तो आपका ईमान और अल्लाह पर भरोसा मज़बूत होता है।

दुआ की क़ुबूलियत में रुकावट बन सकने वाली चीज़ें

अगर आप यह सोच रहे हैं कि दुआ क़ुबूल क्यों नहीं होती, तो हमें अपने अंदर भी झांकना चाहिए। सही हदीस में कुछ ऐसी चीज़ों का ज़िक्र मिलता है जो दुआ की क़ुबूलियत में रुकावट बन सकती हैं।

रुकावटसही हदीस का मफ़हूम / हवाला
हराम कमाई और रिज़्क़नबी ﷺ ने एक शख़्स का ज़िक्र किया जो लंबा सफ़र करता है, बाल बिखरे हैं और आसमान की तरफ़ हाथ उठाकर “या रब, या रब” कहता है, मगर उसका खाना, पीना और पहनना हराम का है, तो उसकी दुआ कैसे क़ुबूल हो? (सही मुस्लिम: 1015)
रिज़्क़ की परेशानी, क़र्ज़ या आर्थिक तंगी से जूझ रहे हों, तो रिज़्क़ में बरकत और क़र्ज़ से निजात की दुआ भी पढ़ सकते हैं।
जल्दबाज़ी करनाबंदे की दुआ उस वक़्त तक क़ुबूल होती है जब तक वो जल्दबाज़ी न करे। सहाबा ने पूछा जल्दबाज़ी क्या है? फ़रमाया: “बंदा कहे कि मैंने दुआ की, फिर दुआ की, मगर मेरी दुआ क़ुबूल नहीं हुई,” और फिर दुआ छोड़ दे। (सही मुस्लिम: 2735)
गुनाह और क़ता-रहमीदुआ में गुनाह या रिश्तेदारी तोड़ने की बात नहीं होनी चाहिए, और बंदे को दुआ छोड़कर मायूस नहीं होना चाहिए। (सही मुस्लिम: 2735)
दिल की ग़फ़लतदुआ करते समय दिल को अल्लाह की तरफ़ लगाना और क़ुबूलियत की उम्मीद रखना चाहिए। (जामे अत-तिर्मिज़ी: 3479 — इस हदीस की ग्रेडिंग में अहले-इल्म के बीच इख़्तिलाफ़ मिलता है)

दुआ क़ुबूल होने के आदाब

अगर वाक़ई चाहते हैं कि हमारी दुआएं असर दिखाएं, तो हमें उन तरीक़ों को अपनाने की कोशिश करनी चाहिए जो रसूलुल्लाह की सुन्नत से साबित हैं। दुआ के आदाब को बजा लाना क़ुबूलियत के असबाब में से है।

  • इख़्लास (सच्चाई) – दुआ सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह से की जाए, किसी शिर्क या दिखावे के बिना।
  • अल्लाह की हम्द और दरूद शरीफ़ – दुआ की शुरुआत अल्लाह की तारीफ़ और नबी करीम ﷺ पर दरूद भेजकर करें। फ़ुज़ाला बिन उबैद रज़ि. से रिवायत है कि नबी ﷺ ने एक शख़्स को दुआ में जल्दी करते देखा तो फ़रमाया कि पहले अल्लाह की हम्द करो, फिर मुझ पर दरूद भेजो, फिर जो चाहो मांगो। (सुनन अत-तिर्मिज़ी: 3477)
  • यक़ीन और दिल जमई – अल्लाह पर पूरा भरोसा हो कि वो सुनता है और अपनी हिकमत के मुताबिक़ जवाब देता है।
  • हाथ उठाना और क़िबला रुख़ होना – दुआ में दोनों हाथ उठाना और अगर मुमकिन हो तो क़िबला की तरफ़ रुख़ करना दुआ के आदाब में शामिल है।
  • गिड़गिड़ाकर और बार-बार मांगना – अल्लाह से बार-बार मांगना और दुआ जारी रखना चाहिए। जल्दबाज़ी करके दुआ छोड़ देना सही नहीं।

दुआ कब ज़्यादा क़ुबूल होती है (दुआ का वक़्त)

इस्लाम में कुछ ख़ास औक़ात (वक्त) और हालात ऐसे बताए गए हैं जिनमें दुआ करने की ख़ास फ़ज़ीलत आई है। हमें इन ख़ास वक़्तों पर ख़ास ध्यान देना चाहिए –

  • तहज्जुद का वक़्त (रात का आख़िरी हिस्सा) – सही हदीस के मुताबिक़, अल्लाह हर रात के आख़िरी हिस्से में आसमान-ए-दुनिया पर नुज़ूल फ़रमाता है और पुकारता है: “है कोई मांगने वाला जिसे मैं अता करूं?” (सही बुख़ारी: 1145) तहज्जुद की नमाज़ कैसे पढ़ी जाती है और इसके बारे में विस्तार से जानने के लिए नमाज़-ए-तहज्जुद पढ़ने का सही तरीका और इसकी फ़ज़ीलत पढ़ें।
  • सजदे की हालत – नबी ﷺ ने फ़रमाया: “बंदा अपने रब के सबसे ज़्यादा क़रीब सजदे की हालत में होता है, पस सजदे में ज़्यादा दुआ किया करो।” (सही मुस्लिम: 482)
  • अज़ान और इक़ामत के दरमियान – “अज़ान और इक़ामत के दरमियान की गई दुआ रद्द नहीं होती।” (सुनन अत-तिर्मिज़ी: 212)
  • रोज़ा इफ़्तार करते वक़्त – रोज़ेदार की दुआ के बारे में क़ुबूलियत की रिवायतें आई हैं। (सुनन इब्ने माजा: 1753)
  • जुमा के दिन एक ख़ास घड़ी – जुमा के दिन एक ऐसा वक़्त आता है जिसमें कोई मुसलमान बंदा अल्लाह से जो मांगता है, अल्लाह उसे देता है। इस वक़्त की तअय्युन में अहले-इल्म के बीच इख़्तिलाफ़ है। (सही बुख़ारी: 935, सही मुस्लिम: 852)
  • सफ़र और मज़लूम की दुआ – मुसाफ़िर और मज़लूम की दुआ के बारे में भी अहादीस में ख़ास तौर पर ज़िक्र आया है।

जब दुआ देर से क़ुबूल हो तो मोमिन का रवैया कैसा होना चाहिए

जब आपकी दुआ में ताख़ीर हो रही हो, तो यह आपके ईमान और सब्र का इम्तिहान हो सकता है। उस वक़्त एक सच्चे मोमिन को इन बातों पर अमल करना चाहिए –

अल्लाह से अच्छी उम्मीद :- हमेशा अल्लाह के बारे में अच्छा गुमान रखें। हदीस-ए-क़ुदसी है कि अल्लाह फ़रमाता है: “मैं अपने बंदे के गुमान के मुताबिक़ हूं जो वो मेरे बारे में रखता है।” (सही बुख़ारी: 7405)

सब्र और तवक्कुल :- दुआ और सब्र साथ-साथ चलते हैं। अल्लाह पर अपना मामला छोड़ दें और कहें: “मेरे मौला, मैं तेरी रज़ा में राज़ी हूं।”

इस्तिग़फ़ार की कसरत :- अपने गुनाहों से तौबा और इस्तिग़फ़ार करते रहना चाहिए। इस्तिग़फ़ार बंदे को अल्लाह की तरफ़ लौटने और अपने आमाल को सुधारने की याद दिलाता है।

लोग दुआ के बारे में कौन सी ग़लतफ़हमियां रखते हैं

आजकल के दौर में सोशल मीडिया और दीन की सही समझ न होने की वजह से दुआ के तअल्लुक़ से बहुत सी ग़लतफ़हमियां आम हो गई हैं –

  • अल्लाह ने मेरी दुआ नहीं सुनी – ऐसा समझ लेना सही नहीं। अल्लाह अपने बंदों की पुकार से बेख़बर नहीं है। दुआ का जवाब हमारी चाहत के मुताबिक़ और हमारी तय की हुई समय-सीमा के मुताबिक़ आना ज़रूरी नहीं।
  • सोशल मीडिया के वायरल वज़ीफ़े – लोग समझते हैं कि किसी वीडियो में बताए गए “3 दिन में करोड़पति बनने का वज़ीफ़ा” या “100 बार फ़लाना लफ़्ज़ पढ़ने से सब ठीक हो जाएगा” से ही सब होगा। याद रखें, क़ुरान और सही हदीस से साबित-शुदा दुआएं और आदाब ही सबसे अफ़ज़ल हैं। किसी मख़सूस गिनती पर ज़ोर देना जब तक हदीस से साबित न हो, सही नहीं है।
  • सिर्फ़ एक बार दुआ करना – कुछ लोग एक-दो बार मांगकर छोड़ देते हैं। दुआ कोई जादू की छड़ी नहीं है, यह इबादत है। इबादत जारी रखनी चाहिए।
  • हर देर का मतलब इनकार समझना – देर होने का मतलब यह हरगिज़ नहीं कि अल्लाह ने मना कर दिया। हमें अपनी सीमित समझ की वजह से अल्लाह की हिकमत पर फैसला नहीं करना चाहिए।

अल्लाह से मज़बूत रिश्ता बनाने के लिए रोज़मर्रा की रूटीन

अगर आप चाहते हैं कि आपकी दुआओं के साथ आपका अल्लाह से रिश्ता भी मज़बूत हो, तो अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को इस check list के मुताबिक़ ढालने की कोशिश करें –

सुबह का वक़्त

  • फ़ज्र की नमाज़ – वक़्त पर जमात के साथ (मर्दों के लिए) या घर पर अदब के साथ अदा करें।
  • सुबह के अज़कार – सही हदीस से साबित सुबह के मसनून अज़कार पढ़ें।
  • इस्तिग़फ़ार – कम से कम 100 मर्तबा अस्तग़फिरुल्लाह कहें।
  • क़ुरान तिलावत – रोज़ाना थोड़ा हिस्सा तर्जुमे और समझ के साथ पढ़ें।
  • सुबह की दुआ – दिन के ख़ैर-ओ-बरकत की दुआ करें।

दोपहर और शाम

  • हलाल कमाई – अपनी कमाई को हराम और सूद से बिल्कुल पाक रखने की कोशिश करें।
  • नेक आमाल – किसी की मदद करें, मुस्कुराकर बात करें, और ग़ीबत (backbiting) से बचें।
  • तवक्कुल – हर काम के दौरान अल्लाह पर भरोसा रखें और नमाज़-ए-ज़ुहर और असर का ख़ास ख़याल रखें।

रात का वक़्त

  • मग़रिब और इशा – नमाज़-ए-बा-जमात और रात के अज़कार।
  • तहज्जुद (अगर मुमकिन हो) – अगर रात के आख़िरी हिस्से में आंख खुले तो 2 रकात ही सही, ज़रूर पढ़ें और दुआ करें।
  • मुहासबा (सेल्फ़-अकाउंटेबिलिटी) – सोने से पहले सोचें कि आज कोई गुनाह तो नहीं हुआ, और तौबा करें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

Que 1. मेरी दुआ क़ुबूल क्यों नहीं हो रही?
Ans.: आपकी दुआ के बारे में जल्दबाज़ी में यह फैसला नहीं करना चाहिए कि वह ज़ाया हो रही है। सही मुस्लिम (हदीस: 2735) के मुताबिक़, बंदे को दुआ करते हुए जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए और “मैंने दुआ की लेकिन क़ुबूल नहीं हुई” कहकर दुआ छोड़नी नहीं चाहिए। अपने रिज़्क़, आमाल और दुआ के आदाब पर भी ग़ौर करें।

Que 2.क्या अल्लाह हर एक की दुआ सुनता है?
Ans. हां, अल्लाह तआला अपने बंदों की पुकार से बेख़बर नहीं है। सूरह अल-बक़रह (आयत: 186) में अल्लाह ने फ़रमाया कि “मैं क़रीब हूं और पुकारने वाले की पुकार का जवाब देता हूं।”

Que 3. दुआ कितनी बार करनी चाहिए?
Ans. दुआ कोई गिनती तक महदूद नहीं है। सुन्नत यह सिखाती है कि बंदे को अल्लाह से बार-बार मांगना चाहिए और जल्दबाज़ी में दुआ छोड़नी नहीं चाहिए।

Que 4. क्या हर दुआ फ़ौरन क़ुबूल होती है?
Ans. नहीं, हर दुआ फ़ौरन ज़ाहिरी तौर पर पूरी नहीं होती। यह अल्लाह की हिकमत पर मुनहसिर है। वो जानता है कि आपके लिए कब और क्या बेहतर है।

Que 5. हराम कमाई दुआ को कैसे रोकती है?
Ans. सही मुस्लिम (1015) की हदीस के मुताबिक़, जिस शख़्स का खाना, पीना और पहनना हराम से हो, उसकी दुआ की क़ुबूलियत के बारे में नबी ﷺ ने सख़्त चेतावनी दी है। इसलिए हलाल रिज़्क़ की फ़िक्र दुआ के आदाब और क़ुबूलियत के अहम असबाब में से है।

Que 6. क्या तहज्जुद से दुआ जल्दी क़ुबूल होती है?
Ans. तहज्जुद और रात के आख़िरी हिस्से में दुआ करने की ख़ास फ़ज़ीलत है। सही बुख़ारी (1145) में इस वक़्त अल्लाह की तरफ़ से पुकार और मांगने वालों को अता किए जाने का ज़िक्र आया है। लेकिन इसे इस तरह नहीं समझना चाहिए कि हर दुआ का जवाब ज़रूर हमारी तय की हुई जल्दी के मुताबिक़ आएगा।

Que 7. क्या अल्लाह बेहतर चीज़ अता करता है?
Ans. सूरह अल-बक़रह (आयत: 216) हमें यह समझाती है कि इंसान किसी चीज़ को अपने लिए अच्छा समझ सकता है जबकि अल्लाह उसके बारे में उससे बेहतर जानता है। इसलिए जो चीज़ हमें न मिली, उसके बारे में हम यह नहीं जानते कि उसके पीछे क्या हिकमत है।

Que 8. दुआ और तक़दीर का क्या तअल्लुक़ है?
Ans. दुआ और तक़दीर के बारे में अहादीस में ज़िक्र आया है। जामे अत-तिर्मिज़ी (2139) में दुआ के ज़रिए क़ज़ा को टलने का ज़िक्र है, और इमाम तिर्मिज़ी ने इसे हसन कहा है, हालांकि इस रिवायत की मौजूदा ऑनलाइन grading में इख़्तिलाफ़ मिलता है। इसलिए इसे इस तरह समझना चाहिए कि दुआ भी अल्लाह के इल्म और उसकी तक़दीर के दायरे में है; ऐसा नहीं कि दुआ अल्लाह के इल्म से बाहर कोई नई चीज़ पैदा करती है।

Que 9. क्या बार-बार वही दुआ मांगना सही है?
Ans. हां, एक ही चीज़ को बार-बार अल्लाह से मांगना जायज़ है। बल्कि सही मुस्लिम की हदीस से यह बात साफ़ होती है कि बंदे को जल्दबाज़ी करके दुआ छोड़नी नहीं चाहिए।

Que 10. अगर दुआ देर से क़ुबूल हो तो क्या करें?
Ans. सब्र करें, इस्तिग़फ़ार बढ़ा दें, अल्लाह से हुस्न-ए-ज़न (अच्छी उम्मीद) रखें और जल्दबाज़ी में आकर दुआ करना हरगिज़ न छोड़ें।

Conclusion

आख़िरी बात यह है कि जब दुआ क़ुबूल न हो तो क्या समझें , का सबसे बड़ा सबक़ यह है कि अल्लाह अपने बंदों पर बेहद रहम करने वाला है। हर चीज़ की हिकमत हमें मालूम नहीं होती, इसलिए हर देर को इनकार और हर न मिलने वाली चीज़ को सज़ा समझ लेना सही नहीं।

अल्लाह हमारी दुआओं को सुनता है और हमारी हालत, हमारी ज़रूरत और हमारे अंजाम को हमसे बेहतर जानता है। एक मोमिन का काम मांगना, कोशिश करना, सब्र करना और अल्लाह पर तवक्कुल रखना है। इसलिए मायूसी को अपने क़रीब न आने दें। दुआ मांगना ख़ुद एक इबादत है। जब आप हाथ उठाते हैं तो आप ख़ाली हाथ नहीं होते, बल्कि आप अपने रब के सामने अपनी ज़रूरत और अपनी बंदगी का इज़हार कर रहे होते हैं।

सब्र, तवक्कुल और यक़ीन के साथ अल्लाह से रिश्ता जोड़े रखें। क्योंकि मोमिन के लिए दुआ सिर्फ़ किसी चीज़ को हासिल करने का ज़रिया नहीं, बल्कि अपने रब के और क़रीब होने का एक रास्ता भी है।

Mohammad Naushad

अस्सलामु अलैकुम! मेरा नाम मौहम्मद नौशाद है और मैं Deen Ki Roshni का फ़ाउंडर हूँ। मैं क़ुरआन, सहीह हदीस और भरोसेमंद इस्लामी किताबों की रोशनी में आसान हिंदी में इस्लामी मालूमात आप तक पहुँचाने की कोशिश करता हूँ। अगर मेरे लिखे हुए लेखों से किसी एक इंसान को भी दीन की सही समझ हासिल हो जाए, तो मैं इसे अपने लिए अल्लाह की बड़ी नेमत समझता हूँ।

Leave a Comment