हफ़्ते के सात दिन होते हैं, मगर मुसलमानों के दिल में एक दिन की जगह बिल्कुल अलग है। जुमा की सुबह घरों में कुछ अलग ही रौनक होती है। कोई नहा-धोकर साफ़ कपड़े निकालता है, कोई इत्र ढूंढता है, बच्चे नए कुर्ते की ज़िद करते हैं, और मस्जिदों की तरफ़ जाने वाली सड़कों पर चहल-पहल बढ़ जाती है। कई लोग इस दिन एक-दूसरे को जुमा मुबारक कहते हैं। लेकिन क्या हम जानते हैं कि इस दिन को इतना ख़ास क्यों बनाया गया? इसकी क्या फ़ज़ीलत है, इसके क्या आदाब हैं, और इसे छोड़ देने पर क्या वईद आई है?
आज इसी सवाल को क़ुरान और सही हदीसों की रोशनी में, तसल्ली से समझते हैं।
क़ुरान में जुमा का ज़िक्र
जुमा की अहमियत का सबसे बड़ा सबूत यह है कि क़ुरान में एक पूरी सूरत का नाम ही सूरह अल-जुमुआ है। इसकी आयत 9 और 10 में अल्लाह तआला फ़रमाता है:
“يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا نُودِيَ لِلصَّلَاةِ مِن يَوْمِ الْجُمُعَةِ فَاسْعَوْا إِلَىٰ ذِكْرِ اللَّهِ وَذَرُوا الْبَيْعَ ۚ ذَٰلِكُمْ خَيْرٌ لَّكُمْ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ”
तर्जुमा: “ऐ ईमान वालो! जब जुमा के दिन नमाज़ के लिए पुकारा जाए तो अल्लाह के ज़िक्र की तरफ़ दौड़ पड़ो और ख़रीद-फ़रोख़्त छोड़ दो। यह तुम्हारे लिए बेहतर है, अगर तुम जानते हो।” (सूरह अल-जुमुआ: 9)
और अगली ही आयत में फ़रमाया: “फिर जब नमाज़ पूरी हो जाए तो ज़मीन में फैल जाओ, अल्लाह का फ़ज़ल तलाश करो और अल्लाह को कसरत से याद करो ताकि तुम कामयाब हो।” (सूरह अल-जुमुआ: 10)
इन दो आयतों में बहुत कुछ छुपा है। पहली बात, अज़ान होते ही कारोबार, दुकान और सौदे सब छोड़कर मस्जिद की तरफ़ चलने का हुक्म है। यानी रोज़ी-रोटी बहुत ज़रूरी है, लेकिन अल्लाह के बुलावे के आगे नहीं। दूसरी बात, नमाज़ ख़त्म होते ही दोबारा रोज़ी की तलाश में लग जाने की इजाज़त भी दी गई है। दीन इंसान को दुनिया से काटता नहीं, बल्कि दोनों में तवाज़ुन सिखाता है। “सअय” के लफ़्ज़ का मतलब भागना नहीं, बल्कि पूरी संजीदगी और तवज्जो के साथ चल पड़ना है।
जुमा, सारे दिनों का सरदार
नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया: “सबसे बेहतरीन दिन जिस पर सूरज निकलता है, जुमा का दिन है। इसी दिन आदम अलैहिस्सलाम पैदा किए गए, इसी दिन उन्हें जन्नत में दाख़िल किया गया, इसी दिन उन्हें वहां से निकाला गया, और क़यामत भी जुमा ही के दिन क़ायम होगी।” (सही मुस्लिम: 854)
एक और हदीस में आता है कि अल्लाह ने हमसे पहले की उम्मतों को जुमा से भटका दिया। यहूदियों के लिए हफ़्ता (सनीचर) और ईसाइयों के लिए इतवार का दिन रहा, और अल्लाह ने इस उम्मत को जुमा की हिदायत दी। (सही मुस्लिम: 856) यह इस उम्मत पर अल्लाह का ख़ास इनाम है।
इब्ने माजा की एक रिवायत में नबी ﷺ ने जुमा को मुसलमानों की ईद का दिन बताया है, और फ़रमाया कि जो जुमा के लिए आए वो ग़ुस्ल करे, और अगर इत्र हो तो लगाए, और मिस्वाक करे। (सुनन इब्ने माजा: 1098) इस वजह से उलेमा जुमा को हफ़्ते की ईद कहते आए हैं।
जुमा की नमाज़ का मक़ाम
जुमा की नमाज़ बालिग़, अक़्लमंद, मुक़ीम मुस्लिम मर्दों पर फ़र्ज़ है, बशर्ते फ़र्ज़ होने की शर्तें पूरी हों और कोई मान्य शरई उज़्र न हो। बीमारों, मुसाफ़िरों और अन्य लोगों के अहकाम में फ़िक़्ही तफ़सील हो सकती है। औरतों पर जुमा फ़र्ज़ नहीं है; अगर वे जुमा की नमाज़ अदा करें तो उनकी नमाज़ सही होती है।
इसकी अहमियत का अंदाज़ा इस हदीस से लगाइए। नबी ने फ़रमाया: “जो शख़्स लगातार तीन जुमे सुस्ती और लापरवाही में छोड़ दे, अल्लाह उसके दिल पर मुहर लगा देता है।” (सुनन अबू दाऊद: 1052, सुनन अत-तिर्मिज़ी: 500, हसन) और सही मुस्लिम की एक हदीस में है कि लोग जुमा छोड़ने से बाज़ आ जाएं, वरना अल्लाह उनके दिलों पर मुहर लगा देगा और वो ग़ाफ़िलों में हो जाएंगे। (सही मुस्लिम: 865) ज़रा सोचिए, दिल पर मुहर लग जाना, यानी नसीहत का असर न होना, कितना बड़ा अज़ाब है।
हां, औरतों, बच्चों, मुसाफ़िरों और बीमारों पर जुमा फ़र्ज़ नहीं, और इस पर उलेमा का इत्तिफ़ाक़ है। औरतें अगर जुमा में आना चाहें तो आ सकती हैं, वरना घर पर ज़ुहर पढ़ेंगी।
जुमा के दिन के गुनाहों की माफ़ी
नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया: “5 वक़्त की नमाज़ें, एक जुमा दूसरे जुमे तक, और एक रमज़ान दूसरे रमज़ान तक, इनके दरमियान होने वाले गुनाहों का कफ़्फ़ारा बन जाती हैं, बशर्ते कि कबीरा गुनाहों से बचा जाए।” (सही मुस्लिम: 233)
यह हदीस हमें दो चीज़ें सिखाती है। एक, अल्लाह की रहमत बहुत वसी है। दूसरी, यह रहमत हमें कबीरा गुनाहों से बचने की ज़िम्मेदारी भी देती है। यानी जुमे की फ़ज़ीलत पर भरोसा करके गुनाह करते रहना सही नहीं।
जुमा के आदाब और सुन्नतें
जुमा की फ़ज़ीलतें पाने के लिए कुछ आदाब सुन्नत से साबित हैं:
1. ग़ुस्ल करना – नबी ﷺ ने फ़रमाया: जुमा के दिन ग़ुस्ल करने की बहुत ताकीद आई है। इसके वुजूब या सुन्नत होने के बारे में उलेमा के बीच फ़िक़्ही मतभेद है। इसलिए इसे मामूली अमल न समझें और अपनी फ़िक़्ही राय के मुताबिक़ इस पर अमल करें। (सहीह बुख़ारी: 877, 880)
2. मिस्वाक, इत्र और साफ़-सुथरे कपड़े – नबी ﷺ ने ग़ुस्ल, मिस्वाक और इत्र लगाने की तरग़ीब दी। (सही बुख़ारी: 880) अपनी हैसियत के मुताबिक़ सबसे अच्छे, साफ़ कपड़े पहनना सुन्नत है।
3. जल्दी मस्जिद जाना – नबी ﷺ ने फ़रमाया: “जो जुमा के दिन जनाबत के ग़ुस्ल की तरह नहाया और पहली घड़ी में गया, उसने गोया एक ऊंट सदक़ा किया। जो दूसरी घड़ी में गया, उसने गाय सदक़ा की। तीसरी में गया तो सींग वाला मेंढा। चौथी में गया तो मुर्ग़ी। पांचवीं में गया तो अंडा। फिर जब इमाम (ख़ुतबे के लिए) निकल आता है, तो फ़रिश्ते ज़िक्र सुनने के लिए हाज़िर हो जाते हैं।” (सही बुख़ारी: 881, सही मुस्लिम: 850) यानी जितनी जल्दी पहुंचेंगे, उतना बड़ा सवाब।
4. ख़ुतबा ख़ामोशी से सुनना – नबी ﷺ ने फ़रमाया: “जब इमाम ख़ुतबा दे रहा हो और तुमने अपने साथी से कहा ‘चुप रहो’, तो तुमने भी बेकार बात की।” (सही बुख़ारी: 934, सही मुस्लिम: 851) जब “चुप रहो” कहना भी मना है, तो मोबाइल चलाना, बातें करना या इधर-उधर देखना कितना ग़लत होगा।
5. जुमा के दिन दरूद की कसरत – नबी ﷺ ने फ़रमाया: “जुमा के दिन मुझ पर कसरत से दरूद भेजा करो, क्योंकि तुम्हारा दरूद मुझे पेश किया जाता है।” (सुनन अबू दाऊद: 1047, सुनन अन-नसाई) इस हदीस की सनद को बहुत से मुहद्दिसीन ने सही कहा है।
6. सूरह अल-कहफ़ की तिलावत – एक रिवायत में आता है कि जो जुमा के दिन सूरह अल-कहफ़ पढ़ेगा, उसके लिए दो जुमों के दरमियान एक नूर रोशन हो जाएगा। (अल-हाकिम, अल-बैहक़ी) इस रिवायत के मर्फ़ूअ होने पर उलेमा के दरमियान कलाम रहा है, लेकिन बहुत से मुहद्दिसीन ने इसे क़ुबूल किया है और उम्मत में इस पर अमल का रिवाज़ चला आया है।
वो ख़ास घड़ी जिसमें दुआ रद्द नहीं होती
नबी करीम ﷺ ने जुमा का ज़िक्र करते हुए फ़रमाया: “इसमें एक ऐसी घड़ी है कि कोई मुसलमान बंदा, जो उस वक़्त नमाज़ पढ़ रहा हो और अल्लाह से कुछ मांगे, तो अल्लाह उसे ज़रूर अता फ़रमाता है।” और अपने हाथ से इशारा करके बताया कि वो घड़ी बहुत थोड़ी है। (सही बुख़ारी: 935, सही मुस्लिम: 852)
यह घड़ी कौन सी है, इस बारे में उलेमा की दो मशहूर राएं हैं:
- इमाम के मिंबर पर बैठने से लेकर नमाज़ ख़त्म होने तक का वक़्त (सही मुस्लिम: 853)।
- अस्र के बाद से मग़रिब तक का आख़िरी वक़्त (सुनन अबू दाऊद: 1048, सुनन अन-नसाई)।
बहुत से उलेमा का रुझान दूसरी राय की तरफ़ है, और सबसे महफ़ूज़ रास्ता यही है कि दोनों वक़्तों में दुआ का एहतमाम किया जाए। जुमे के दिन अस्र के बाद मोबाइल और बातों से हटकर अपने रब से मांगने के लिए कुछ वक़्त निकालना बहुत क़ीमती अमल है। अगर आपकी दुआ क़ुबूल होने में देर हो रही है, तो इस्लाम इस बारे में क्या सिखाता है? इसे समझने के लिए हमारा लेख जब दुआ क़ुबूल न हो तो क्या समझें? इस्लाम क्या सिखाता है भी पढ़ें।
जुमा के दिन ख़ास तौर पर क्या न करें
- जुमा की नमाज़ के लिए इमाम के आने पर दी जाने वाली पुकार के बाद, जिन लोगों पर जुमा फ़र्ज़ है, उनके लिए ख़रीद-फ़रोख़्त छोड़कर नमाज़ की ओर जाना ज़रूरी है। (सूरह अल-जुमुआ: 9)
- अकेला जुमे का रोज़ा। नबी ﷺ ने सिर्फ़ जुमे के दिन का रोज़ा रखने से मना फ़रमाया, सिवाए इसके कि उससे पहले या बाद का दिन भी रोज़ा हो। (सही बुख़ारी: 1985, सही मुस्लिम: 1144)
- जुमे की रात को इबादत के लिए ख़ास करना। नबी ﷺ ने जुमे की रात को दूसरी रातों में से क़ियाम के लिए ख़ास करने से मना फ़रमाया। (सही मुस्लिम: 1144)
- ख़ुतबे के दौरान बातें करना, मोबाइल इस्तेमाल करना या लोगों की गर्दनें फलांगना।
जुमा से जुड़ी कुछ आम ग़लतफ़हमियां
जुमा के दिन फ़लां वज़ीफ़ा पढ़ने से हर काम हो जाता है। जुमे की फ़ज़ीलत सहीह है, लेकिन जो आमाल सही हदीस से साबित नहीं, उन्हें दिन की ख़ास सुन्नत बना देना सही नहीं। ऊपर बताए हुए आमाल, यानी ग़ुस्ल, जल्दी जाना, दरूद, सूरह कहफ़ और दुआ, इन्हें सुन्नत के मुताबिक़ अपनाइए।
जुमा मुबारक कहना। यह एक अच्छी दुआ-नुमा बात है और लोगों में मोहब्बत बढ़ाती है, लेकिन इसके लिए कोई ख़ास सही हदीस साबित नहीं है। कुछ उलेमा इसे जायज़ रिवाज़ समझते हैं और कुछ इसे सुन्नत समझकर करने से रोकते हैं। बेहतर यही है कि इसे इबादत या सुन्नत का दर्जा न दें, और अपने इलाक़े के भरोसेमंद आलिम से मसला पूछ लें।
“जुमा के दिन मौत की बड़ी फ़ज़ीलत।” इस बारे में जो रिवायतें आती हैं उन पर उलेमा ने कलाम किया है। हमारा काम अच्छे अमल पर ज़ोर देना है, और बाक़ी अल्लाह के सुपुर्द करना।
जुमे की सुन्नतें अपनाने का एक आसान प्लान
जुमे की रात: सूरह अल-कहफ़ पढ़ने की नियत करें और जल्दी सोएं।
जुमे की सुबह: फ़ज्र की नमाज़ के बाद कुछ देर क़ुरान पढ़ें और ग़ुस्ल की तैयारी करें।
मस्जिद जाने से पहले: ग़ुस्ल, साफ़ कपड़े, मिस्वाक और इत्र।
मस्जिद में: जितना जल्दी हो सके पहुंचें, नफ़्ल पढ़ें, तिलावत और दरूद में लगे रहें, ख़ुतबा तवज्जो से सुनें।
नमाज़ के बाद: बच्चों को साथ लेकर गए हों तो उनकी हौसला-अफ़ज़ाई करें, और रिश्तेदारों-पड़ोसियों से मिलें।
अस्र के बाद: मोबाइल दूर रखकर दुआ और इस्तिग़फ़ार के लिए कुछ वक़्त निकालें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Que.1 जुमा को सय्यिदुल अय्याम (दिनों का सरदार) क्यों कहा जाता है?
Ans. क्योंकि सही हदीस के मुताबिक़ यह सबसे बेहतरीन दिन है जिस पर सूरज निकलता है। इसी दिन आदम अलैहिस्सलाम की तख़लीक़ हुई और क़यामत भी इसी दिन आएगी। (सही मुस्लिम: 854)
Que.2 क्या जुमा की नमाज़ औरतों पर फ़र्ज़ है?
Ans. नहीं, यह मर्दों पर फ़र्ज़ है। औरतें, मुसाफ़िर, बीमार और नाबालिग़ बच्चे इससे मुस्तसना हैं। औरतें चाहें तो मस्जिद में आ सकती हैं, वरना घर पर ज़ुहर पढ़ें।
Que.3 जुमा की दुआ क़ुबूल होने की घड़ी कौन सी है?
Ans. उलेमा की दो मशहूर राएं हैं: इमाम के ख़ुतबे के लिए बैठने से नमाज़ ख़त्म होने तक, या अस्र के बाद का आख़िरी वक़्त। दोनों वक़्तों में दुआ का एहतमाम करना बेहतर है।
Que.4 क्या जुमे की अज़ान के बाद कारोबार करना जायज़ है?
Ans. नहीं। सूरह अल-जुमुआ (आयत 9) में साफ़ हुक्म है कि अज़ान के बाद ख़रीद-फ़रोख़्त छोड़कर नमाज़ की तरफ़ चल पड़ो। नमाज़ के बाद दोबारा कारोबार जायज़ है।
Que.5 क्या सिर्फ़ जुमे के दिन रोज़ा रख सकते हैं?
Ans. अकेले जुमे का रोज़ा मकरूह है, यानी उससे पहले (जुमेरात) या बाद (हफ़्ता) का दिन भी रोज़ा रखें। हां, अगर जुमा किसी ख़ास रोज़े (जैसे अरफ़ा या आशूरा) के दिन आ जाए तो कोई हर्ज नहीं।
Que.6 जुमा छोड़ने वाले के लिए क्या वईद आई है?
Ans. नबी ﷺ ने फ़रमाया कि जो तीन जुमे सुस्ती से छोड़े, अल्लाह उसके दिल पर मुहर लगा देता है। (सुनन अबू दाऊद: 1052, सुनन अत-तिर्मिज़ी: 500)
Que.7 जुमे की सुन्नत और नफ़्ल नमाज़ें कितनी हैं?
Ans. इस पर उलेमा के मसलक के मुताबिक़ तफ़सील अलग-अलग है। आम तौर पर जुमे से पहले तहिय्यतुल मस्जिद और नफ़्ल, और बाद में दो से चार रकात सुन्नत का ज़िक्र मिलता है। अपने मसलक के मुताबिक़ किसी आलिम से पूछ लें।
आख़िर में एक बात
जुमा का दिन अल्लाह की तरफ़ से इस उम्मत के लिए एक तोहफ़ा है। हफ़्ते भर की भाग-दौड़ के बीच एक ऐसा दिन, जो हमें रुककर अपने रब के सामने खड़े होने, गुनाहों की माफ़ी मांगने, एक-दूसरे से मिलने और अपने ईमान को ताज़ा करने का मौक़ा देता है। जिस तरह हम किसी की दावत पर सज-संवरकर वक़्त से पहुंचते हैं, उसी तरह अल्लाह की इस दावत का हक़ भी यही है कि हम इसे अहमियत दें।
अब आप ख़ुद से एक सवाल पूछिए: मेरा पिछला जुमा कैसा था? क्या मैं जल्दी पहुंचा? क्या मैंने ख़ुतबा तवज्जो से सुना? क्या मैंने अस्र के बाद दुआ की? अगर जवाब “नहीं” है, तो आने वाले जुमे से एक-एक सुन्नत अपनाना शुरू कीजिए। अल्लाह हमें जुमे की क़द्र करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।






