इस्लाम और रस्म-ओ-रिवाज के बीच फ़र्क़ समझना हर मुसलमान के लिए ज़रूरी है। हमारे मुआशरा में कई ऐसी ख़यालात प्रचलित हैं जिन्हें लोग दीन का हिस्सा समझते हैं, जबकि उनकी इस्लामी बुनियाद को क़ुरआन और सही हदीस की रोशनी में समझना ज़रूरी है। हमारे घरों में कुछ बातें इतनी पुरानी और इतनी आम हैं कि हम कभी सवाल ही नहीं करते। बच्चे के गले में धागा बांध दिया गया, दुकान के बाहर नींबू-मिर्च लटका दी गई, किसी ने कहा “आज तारीख़ अच्छी नहीं है, सफ़र मत करो”, और हमने मान लिया। बचपन से देखा, बड़ों को करते देखा, तो दिल ने मान लिया कि यही दीन है। लेकिन जब कोई इंसान तसल्ली से क़ुरान और सही हदीस पढ़ता है, तो उसे अक्सर हैरानी होती है कि जिन चीज़ों को वो इस्लाम समझता आया, उनमें से कई का वहां ज़िक्र तक नहीं मिलता। वो या तो पुरानी कौमों से आई रस्में हैं, या इलाक़ाई रिवाज, या सिर्फ़ डर और वहम की पैदावार।
यह तहरीर किसी पर उंगली उठाने के लिए नहीं है। मक़सद सिर्फ़ इतना है कि हम रुककर एक सवाल पूछ सकें: “क्या यह बात मुझे अल्लाह और उसके रसूल ﷺ ने सिखाई है, या मैंने इसे बस विरासत में पाया है?” आइए ऐसी दस बातों को एक-एक करके समझते हैं।
1. हर ताबीज़ को ज़रूरी इस्लामी हिफ़ाज़त समझना
बहुत से घरों में यह यक़ीन पाया जाता है कि जब तक बच्चे या बड़े के गले या बाज़ू में ताबीज़ न हो, वो महफ़ूज़ नहीं है। लेकिन ज़रा ठहरकर सोचिए, हिफ़ाज़त का असल ज़रिया क्या है? क़ुरान हमें बताता है कि नफ़ा और नुक़सान का मालिक सिर्फ़ अल्लाह है। नबी करीम ﷺ ने सुबह-शाम के अज़कार, आयतुल कुर्सी, आख़िरी तीन सूरतें और मसनून दुआएं सिखाईं, यही असल हिफ़ाज़त है।
ताबीज़ के बारे में एक हदीस आती है जिसमें नबी ﷺ ने तमीमा (उस दौर के गंडे-ताबीज़) लटकाने को शिर्क के क़रीब का अमल बताया। क़ुरानी आयतों वाले ताबीज़ के बारे में उलेमा की राय अलग-अलग रही है, कुछ ने इसकी गुंजाइश दी और बहुत से उलेमा ने इससे मना किया। लेकिन इस पर तमाम उलेमा एक हैं कि जिस ताबीज़ में अजीब निशान, नंबर, ग़ैर-अरबी लफ़्ज़ या जिन्नात और ग़ैर-अल्लाह के नाम हों, वो हरगिज़ जायज़ नहीं। और इससे भी बड़ी बात यह है कि ताबीज़ को ही असल हिफ़ाज़त समझ लेना, अल्लाह पर भरोसे की जगह एक चीज़ पर भरोसा कर लेना है। इसलिए बेहतर रास्ता यही है कि हम क़ुरान की तिलावत और मसनून दुआओं को अपना रोज़ का मामूल बनाएं।
2. काला धागा या काला टीका नज़र से बचाता है, ऐसा मानना
छोटे बच्चे के माथे पर काला टीका, कलाई पर काला धागा, गाड़ी के पीछे फटा जूता या नींबू-मिर्च, यह सब हमारे समाज में नज़र उतारने या बचाने के तरीक़े बन चुके हैं। मगर इस्लाम में इनकी कोई दलील नहीं मिलती। नबी करीम ﷺ ने नज़र का इलाज और बचाव ज़रूर सिखाया है, लेकिन वो है दुआओं के ज़रिए, जैसे हज़रत हसन और हुसैन रज़ि. के लिए आप यह दुआ पढ़ा करते थे: “उईज़ुकुमा बि कलिमातिल्लाहित्ताम्मति मिन कुल्लि शैतानिन व हाम्मतिन व मिन कुल्लि ऐनिन लाम्मह“, यानी मैं तुम दोनों को अल्लाह के मुकम्मल कलिमात की पनाह में देता हूं हर शैतान से, हर ज़हरीले जानवर से और हर बुरी नज़र से। (सही बुख़ारी: 3371)
ग़ौर कीजिए, बचाव का तरीक़ा दुआ है, कोई काला धागा नहीं। जब सही तरीक़ा हमारे पास मौजूद है, तो फिर बे-बुनियाद चीज़ों पर भरोसा क्यों करें? बुरी नज़र से हिफ़ाज़त के लिए क़ुरआन और सुन्नत से साबित दुआएं पढ़ने के लिए हमारा यह तहरीर भी देखें।
3. हर मुश्किल का हल सिर्फ़ वज़ीफ़ा समझना
“फ़लां वज़ीफ़ा इतनी बार पढ़ लो, सब ठीक हो जाएगा।” यह जुमला हम सबने सुना है। इसमें कोई शक नहीं कि दुआ और ज़िक्र बहुत बड़ी ताक़त हैं, और अल्लाह से मांगना हर मुसलमान का हक़ और इबादत है। लेकिन जब वज़ीफ़े को ऐसा नुस्ख़ा बना दिया जाए जिसमें गिनती, दिन, वक़्त और तरतीब सब “तय” हो और यक़ीन यह हो कि बस यह पढ़ लिया तो काम हो ही जाएगा, तब हम दुआ को “रस्म” की शक्ल दे बैठते हैं।
इस्लाम में दुआ का मतलब है अल्लाह से गिड़गिड़ाकर मांगना और फिर अपने हिस्से की कोशिश भी करना। नबी ने ऊंट के मालिक से फ़रमाया था कि पहले ऊंट को बांधो, फिर अल्लाह पर भरोसा करो (सुनन अत-तिर्मिज़ी: 2517)।
यानी तवक्कुल का मतलब हाथ पर हाथ रखकर बैठना नहीं है। बेरोज़गार इंसान नौकरी की कोशिश भी करे और दुआ भी। बीमार इलाज भी कराए और दुआ भी करे। वो वज़ीफ़े जो क़ुरान और सही हदीस से साबित हैं, सर आंखों पर, लेकिन किसी भी गिनती या तरतीब को बिना सबूत ज़रूरी बना देना सही नहीं।
दुआ, सब्र और अल्लाह की हिकमत को बेहतर समझने के लिए हमारा लेख जब दुआ क़ुबूल न हो तो क्या समझें? इस्लाम क्या सिखाता है भी पढ़ें।
4. किसी दिन, महीने या तारीख़ को अपने आप में मनहूस समझना
आज मंगलवार है, नया काम नहीं करेंगे, सफ़र का महीना है, शादी मत करो, 13 तारीख़ बुरी होती है। यह सोच इस्लाम की नहीं, पुरानी जाहिलियत की है। नबी करीम ﷺ ने साफ़ फ़रमाया: “ला अदवा व ला तियरता“, यानी न बीमारी का ख़ुद-ब-ख़ुद लगना कोई चीज़ है और न बदशगुनी लेना। (सही बुख़ारी: 5757, सही मुस्लिम: 2220)
सफ़र के महीने को मनहूस समझने के रिवाज का भी नबी ﷺ ने सीधे तौर पर रद्द किया है। अल्लाह के नज़दीक सारे दिन उसी के बनाए हुए हैं और नफ़ा-नुक़सान उसी के हाथ में है। हां, इस्लाम में कुछ दिनों और रातों की फ़ज़ीलत ज़रूर आई है, जैसे जुमा, रमज़ान, लैलतुल क़द्र, लेकिन किसी दिन को मनहूस क़रार देना इस्लामी तालीम का हिस्सा नहीं।
5. पीर या बुज़ुर्ग से ग़ैबी मदद मांगना
यह मसला सबसे नाज़ुक है, इसलिए इसे पूरे अदब और साफ़गोई के साथ समझना ज़रूरी है। हम नेक लोगों और अल्लाह वालों की इज़्ज़त करते हैं, उनके लिए दुआ करते हैं, और उनसे दुआ की दरख़्वास्त करना भी जायज़ है जब वो ज़िंदा और हमारे सामने हों। लेकिन किसी पीर या बुज़ुर्ग को पुकारना, यह मानना कि वो ग़ैब जानते हैं या दूर से हमारी हाजत पूरी कर सकते हैं, यह तौहीद के बुनियादी अक़ीदे के ख़िलाफ़ है।
क़ुरान में हर नमाज़ की हर रकात में हम यह इक़रार करते हैं: इय्याका नअबुदु व इय्याका नस्तईन, यानी हम तेरी ही इबादत करते हैं और तुझी से मदद मांगते हैं। (सूरह अल-फ़ातिहा: 5)
6. हर बीमारी या परेशानी को सिर्फ़ जिन्न या नज़र का असर समझना
यह एक ऐसी ग़लतफ़हमी है जिसकी वजह से कई जानें गई हैं। नज़र हक़ है, यह हदीस से साबित है (सही बुख़ारी: 5740, सही मुस्लिम: 2187), और जिन्नात का वजूद भी क़ुरान से साबित है। लेकिन इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं कि घर में हर बीमारी, हर बेरोज़गारी, हर झगड़ा, बच्चे का पढ़ाई में कमज़ोर होना या किसी का डिप्रेशन में जाना, सब जिन्न या नज़र का नतीजा है।
नबी करीम ने इलाज करवाने का हुक्म दिया। हदीस में आता है: – ऐ अल्लाह के बंदो! इलाज कराओ, क्योंकि अल्लाह ने कोई बीमारी ऐसी नहीं उतारी जिसकी दवा न उतारी हो। (सुनन अबू दाऊद: 3855, सुनन अत-तिर्मिज़ी: 2038) जब कोई बीमार हो, तो पहले डॉक्टर के पास जाइए, जांच कराइए, और साथ में दुआ और रुक़्या भी कीजिए। मानसिक सेहत की परेशानी को सिर्फ़ जिन्न का असर कहकर इलाज से दूर रखना ज़ुल्म है। इससे मरीज़ की हालत और बिगड़ सकती है, और कभी-कभी झाड़-फूंक करने वाले ढोंगी लोग इसी बात का फ़ायदा उठाकर लोगों को लूटते हैं।
7. सोशल मीडिया के वायरल मैसेज को सच मान लेना
आजकल सबसे तेज़ी से जो चीज़ फैल रही है, वो है फ़ॉरवर्ड। इस मैसेज को 10 लोगों को भेजो, वरना बुरा होगा, इस दुआ को शेयर करो, 24 घंटे में खुशख़बरी मिलेगी, फ़लां बुज़ुर्ग ने ख़्वाब में कहा कि यह मैसेज फैलाओ, इनमें से अक्सर बातें न किसी सही हदीस में हैं, न किसी मोअतबर किताब में।
क़ुरान हमें बाक़ायदा सिखाता है कि अगर कोई फ़ासिक़ तुम्हारे पास कोई ख़बर लाए तो पहले तहक़ीक़ कर लो (सूरह अल-हुजुरात: 6)।
और नबी ﷺ ने फ़रमाया: आदमी के झूठा होने के लिए यही काफ़ी है कि वो जो कुछ सुने, उसे आगे बयान कर दे। (सही मुस्लिम, मुक़द्दमा) नबी ﷺ के नाम से कोई झूठी बात जोड़ना तो और भी संगीन गुनाह है। इसलिए आगे भेजने से पहले एक सवाल ज़रूर पूछिए: इसका हवाला क्या है?
8. बिना दलील किसी अमल को सुन्नत या फ़र्ज़ कह देना
हमारे यहां बहुत आसानी से कह दिया जाता है, यह तो सुन्नत है, यह तो फ़र्ज़ है, यह करना ज़रूरी है, जबकि पूछने पर हवाला कोई नहीं मिलता। फ़र्ज़, वाजिब, सुन्नत, मुस्तहब और मुबाह, इन सबके अपने दर्जे हैं और इन्हें तय करने का हक़ अल्लाह और उसके रसूल को है, किसी ख़ानदान या मोहल्ले के रिवाज को नहीं।
नबी करीम ने फ़रमाया: जिसने हमारे इस दीन में कोई ऐसी नई बात निकाली जो इसका हिस्सा नहीं, तो वो रद्द है। (सही बुख़ारी: 2697, सही मुस्लिम: 1718) इसका मतलब यह नहीं कि हर नई चीज़ हराम है, बल्कि यह कि जिसे इबादत या दीन का दर्जा दिया जाए, उसकी बुनियाद दलील पर होनी चाहिए। और जहां उलेमा के बीच जायज़ इख़्तिलाफ़ हो, वहां दूसरों पर सख़्ती से फ़तवा लगाना भी सही नहीं। जब किसी मसले की दलील न पता हो, तो मुझे नहीं पता, किसी आलिम से पूछकर बताता हूं कहना कमज़ोरी नहीं, इल्म की निशानी है।
9. शादी में जहेज़, मंगनी और भारी रस्मों को दीन का हिस्सा समझना
यह बात हमारे उपमहाद्वीप (Subcontinent) की शादियों में सबसे साफ़ दिखती है। जहेज़ की लंबी लिस्ट, बारात का ख़र्च, मंगनी, मेहंदी, हल्दी और दर्जनों रस्में, और कहा जाता है यह तो हमारे दीन में है। जबकि हक़ीक़त यह है कि इस्लाम में निकाह के असल अरकान बहुत सादे हैं: दोनों की रज़ामंदी, गवाह, मेहर और ऐलान। हज़रत फ़ातिमा रज़ि. के निकाह में सादगी की मिसाल हमारे सामने है, और नबी ﷺ ने फ़रमाया कि सबसे बाबरकत निकाह वो है जिसमें ख़र्च कम हो। (मुस्नद अहमद)
जहेज़ की मांग तो इस्लामी तालीम के बिल्कुल ख़िलाफ़ है, क्योंकि दीन ने मेहर का हक़ मर्द पर रखा है, लड़की के घरवालों पर बोझ नहीं। इस पर तफ़सील से हमारा अलग लेख निकाह में सादगी में पढ़ा जा सकता है।
10. लड़कियों की तालीम या काम पर रोक को इस्लाम का हुक्म समझना
कई जगहों पर यह कहकर लड़कियों की पढ़ाई रोक दी जाती है कि इस्लाम में औरत का काम घर संभालना है, इसे पढ़ाई की क्या ज़रूरत। यह सोच इलाक़ाई रिवाज की है, इस्लाम की नहीं। क़ुरान की पहली वही का पहला लफ़्ज़ ही इक़रा (पढ़ो) है (सूरह अल-अलक़: 1), और यह हुक्म मर्द-औरत दोनों के लिए है। उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा रज़ि. उम्मत की सबसे बड़ी आलिमाओं में से थीं, और सहाबा किराम उनसे दीन के मसले पूछा करते थे।
इस्लाम ने औरत को तालीम, जायदाद और अपनी मर्ज़ी से निकाह का हक़ दिया। हां, पर्दे और हया की हदें अपनी जगह हैं, लेकिन उनकी आड़ में बेटियों को इल्म से महरूम रखना दीन की ख़िदमत नहीं, बल्कि उसके साथ नाइंसाफ़ी है। इस पर हमारा इस्लाम में औरत के हुक़ूक़ क्या हैं? सच्चाई जो 1400 साल पहले ही बता दी गई थी वाला लेख भी देखा जा सकता है।
तो फिर हमें क्या करना चाहिए
इन सब बातों को पढ़कर शायद कुछ लोगों को बुरा लगे, क्योंकि जो चीज़ बचपन से सीखी हो, उसे छोड़ना आसान नहीं होता। लेकिन याद रखिए, सच्चा मुसलमान वो नहीं जो सिर्फ़ विरासत को निभाए, बल्कि वो है जो सच जानने के बाद उसे अपनाने का हौसला रखे। तीन छोटे उसूल हर बात की जांच के लिए काफ़ी हैं:
- पहला सवाल: क्या इसका ज़िक्र क़ुरान या सही हदीस में है?
- दूसरा सवाल: क्या यह मेरे अक़ीदे, यानी सिर्फ़ अल्लाह पर भरोसे, को कमज़ोर तो नहीं करता?
- तीसरा सवाल: अगर मुझे ख़ुद इल्म नहीं, तो क्या मैंने किसी भरोसेमंद, इल्म वाले आलिम से पूछा?
और साथ ही एक बात का ख़याल रखिए, जब किसी को ग़लती करते देखें तो नरमी और ख़ैरख़्वाही से समझाएं, तानों और ज़बरदस्ती से नहीं। दीन की दावत मोहब्बत से दी जाती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सवाल 1: क्या क़ुरान की आयतों वाला ताबीज़ पहनना जायज़ है?
जवाब: इस पर उलेमा की राय अलग-अलग है। कुछ ने गुंजाइश दी है और बहुत से उलेमा ने इससे मना किया है। लेकिन जिन ताबीज़ों में अजीब निशान, नंबर या ग़ैर-अल्लाह के नाम हों, वो बिल्कुल नाजायज़ हैं।
सवाल 2: क्या नज़र लगना सच है?
जवाब: हां, नज़र का लगना हदीस से साबित है। लेकिन उसका बचाव और इलाज दुआओं और रुक़्या से है, काले धागे या टीके से नहीं।
सवाल 3: क्या वज़ीफ़ा पढ़ना ग़लत है?
जवाब: नहीं, ज़िक्र और दुआ बड़ी इबादतें हैं। ग़लतफ़हमी वहां शुरू होती है जब किसी बे-सबूत गिनती या तरतीब को ज़रूरी मान लिया जाए, या सिर्फ़ वज़ीफ़े के भरोसे कोशिश और इलाज छोड़ दिया जाए।
सवाल 4: क्या कोई दिन या तारीख़ मनहूस हो सकती है?
जवाब: नहीं। नबी ﷺ ने बदशगुनी को रद्द फ़रमाया है। सारे दिन अल्लाह के बनाए हुए हैं और नफ़ा-नुक़सान सिर्फ़ उसके हाथ में है।
सवाल 5: क्या बुज़ुर्गों से दुआ की दरख़्वास्त करना ग़लत है?
जवाब: किसी नेक ज़िंदा इंसान से दुआ की दरख़्वास्त करना जायज़ है। ग़लत वो है जब किसी को ग़ैब का जानने वाला या हाजत पूरी करने वाला समझकर पुकारा जाए। हाजत सिर्फ़ अल्लाह से मांगी जाती है।
सवाल 6: कैसे पता चले कि कोई परेशानी जिन्न की है या बीमारी की?
जवाब: ऐसा फ़ैसला किसी झाड़-फूंक करने वाले पर न छोड़ें। पहले डॉक्टर से जांच कराएं, मानसिक सेहत की भी, साथ में दुआ और रुक़्या करें। ज़्यादातर परेशानियों की वजह मेडिकल या समाजी होती है।
सवाल 7: जब किसी मसले की दलील न पता हो तो क्या कहें?
जवाब: मुझे इसकी दलील नहीं पता, मैं किसी आलिम से पूछकर बताता हूं। यह कहना इल्म और अदब की निशानी है।
Conclusion
इस्लाम एक साफ़, आसान और दलील पर टिका हुआ दीन है। उसकी बुनियाद तौहीद, यानी सिर्फ़ अल्लाह पर भरोसे, और रसूलुल्लाह ﷺ की सुन्नत पर है। लेकिन सदियों के सफ़र में उसके साथ बहुत सी रस्में, इलाक़ाई रिवाज और वहम भी जुड़ते चले गए, और हम उन्हें भी दीन समझने लगे। अब वक़्त है कि हम अपने घर से शुरुआत करें, हर बात की दलील पूछें, और जहां दलील न मिले, वहां नरमी से रुक जाएं। जब हम रस्म और दीन के फ़र्क़ को पहचान लेते हैं, तो न सिर्फ़ हमारा ईमान मज़बूत होता है, बल्कि हमारी ज़िंदगी भी वहम और डर से आज़ाद होकर सुकून पाती है।






