रिज़्क़ में बरकत और क़र्ज़ से निजात की दुआ (कुरआन और सहीह अहादीस के हवाले के साथ)

आज के दौर में महंगाई, माली तंगी और मुख़्तलिफ़ परेशानियों से भरी इस दुनिया में हर एक दूसरा शख़्स किसी न किसी मुश्किल से गुज़र रहा है। सभी को अपने घर के ख़र्चे पूरे करना, बच्चों की अच्छी तालीम दिलाना और ज़िंदगी की ज़रूरी ज़रूरतों को पूरा करते-करते इंसान अक्सर क़र्ज़ के बोझ तले दब ही जा रहा है। क़र्ज़ का बोझ ऐसी परेशानी है जो हर एक इंसान की रातों की नींद और दिन का सुकून छीन लेता है। रिज़्क़ की तंगी की वजह से घरों में नाइत्तेफ़ाक़ी और ज़ेहनी तनाव भी बढ़ने लगता है।

अब ऐसे हालात में, एक मुसलमान होने के नाते हमारा यह ईमान होना चाहिए कि हर मुश्किल का हल सिर्फ़ अल्लाह तआला के पास है। इस्लाम हमें सिर्फ़ मेहनत करना ही नहीं सिखाता, बल्कि मुसीबत के वक़्त अल्लाह की तरफ़ रुजू करना और उसी से मदद माँगने का सही तरीक़ा भी बताता है।

बहुत से लोग इंटरनेट और सोशल मीडिया पर मिलने वाले ऐसे वज़ीफ़ों और अमलियात के पीछे भागते हैं जिनका कुरआन और सुन्नत से कुछ भी ताल्लुक़ नहीं होता। लेकिन हक़ीक़त यह है कि कामयाबी और सुकून सिर्फ़ उन्हीं दुआओं और आमाल में है जो अल्लाह और उसके प्यारे रसूल मुहम्मद ﷺ ने हमें सिखाए हैं।

इस आर्टिकल में हम रिज़्क़ में बरकत और क़र्ज़ से निजात की दुआ ( Rizq Mein Barkat Aur Karz Se Nijat Ki Dua ) के बारे में मुकम्मल और मुस्तनद मालूमात शेयर करेंगे, जो पूरी तरह कुरआन-ए-करीम और सहीह अहादीस की रौशनी में हैं।

Table of Contents

इस्लाम में रिज़्क़ का असल तसव्वुर

सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि इस्लाम में “रिज़्क़” (Rizq) का असल मतलब क्या है। आम तौर पर लोग समझते हैं कि रिज़्क़ का मतलब सिर्फ़ पैसा, बैंक बैलेंस या दौलत है, लेकिन यह सोच मुकम्मल नहीं है।

इस्लाम में रिज़्क़ का तसव्वुर बहुत वसीअ (व्या है। रिज़्क़ में हर वह नेमत शामिल है जो अल्लाह तआला ने आपको ज़िंदगी गुज़ारने और सुकून हासिल करने के लिए अता फ़रमाई है। जैसे—

  • अच्छी सेहत
  • नेक औलाद
  • ज़ेहनी सुकून और इत्मीनान
  • ईमान की दौलत
  • वक़्त में बरकत
  • हलाल कमाई का ज़रिया

अल्लाह तआला कुरआन-ए-करीम में फ़रमाता है कि ज़मीन पर मौजूद हर जानदार का रिज़्क़ अल्लाह के ज़िम्मे है।

وَمَا مِن دَابَّةٍ فِي الْأَرْضِ إِلَّا عَلَى اللَّهِ رِزْقُهَا

तर्जुमा: “और ज़मीन पर चलने वाला कोई भी जानदार ऐसा नहीं, जिसका रिज़्क़ अल्लाह के ज़िम्मे न हो।” (सूरह हूद : 6)

इसलिए जब भी आप रिज़्क़ की दुआ करें, तो सिर्फ़ ज़्यादा पैसे की दुआ न करें, बल्कि हलाल रिज़्क़ (Halal Rizq), उसमें बरकत और दिल का सुकून भी माँगें। क्योंकि थोड़ा सा हलाल और बरकत वाला माल, उस ज़्यादा माल से कहीं बेहतर है जिसमें हराम शामिल हो और जो इंसान का सुकून छीन ले।

कुरआन में रिज़्क़ के बारे में क्या फ़रमाया गया है?

कुरआन-ए-करीम हम सभी के लिए एक अज़ीम हिदायत की किताब है। इसमें अल्लाह तआला ने रिज़्क़ में बरकत (Rizq me barkat ) हासिल करने और उसे बढ़ाने के बेहतरीन तरीक़े बयान फ़रमाए हैं। आइए कुरआन की कुछ अहम आयतों को समझते हैं।

1. सूरह नूह की आयत (इस्तिग़फ़ार से रिज़्क़ में बरकत)

अल्लाह तआला ने हज़रत नूह (अ.स.) का क़ौल बयान फ़रमाया है—

فَقُلْتُ اسْتَغْفِرُوا رَبَّكُمْ إِنَّهُ كَانَ غَفَّارًا * يُرْسِلِ السَّمَاءَ عَلَيْكُم مِّدْرَارًا * وَيُمْدِدْكُم بِأَمْوَالٍ وَبَنِينَ وَيَجْعَل لَّكُمْ جَنَّاتٍ وَيَجْعَل لَّكُمْ أَنْهَارًا

तर्जुमा:“मैंने कहा, अपने रब से इस्तिग़फ़ार करो। बेशक वह बहुत ज़्यादा बख़्शने वाला है। वह तुम पर आसमान से खूब बारिश बरसाएगा, तुम्हें माल और औलाद से नवाज़ेगा, तुम्हारे लिए बाग़ पैदा करेगा और नहरें जारी कर देगा।” (सूरह नूह : आयत 10-12)

वज़ाहत: इस आयत से साफ़ मालूम होता है कि सच्चा इस्तिग़फ़ार (अल्लाह से अपने गुनाहों की माफ़ी माँगना) रिज़्क़ में बरकत, माल, औलाद और दूसरी नेमतें हासिल करने का सबसे बड़ा ज़रिया है। अगर इंसान दिल से तौबा करे और इस्तिग़फ़ार को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बना ले, तो अल्लाह तआला उसके लिए अपनी रहमत और बरकत के दरवाज़े खोल देता है।

2. सूरह अत-तलाक़ की आयत (तक़वा और तवक्कुल)

अल्लाह तआला फ़रमाता है

وَمَن يَتَّقِ اللَّهَ يَجْعَل لَّهُ مَخْرَجًا * وَيَرْزُقْهُ مِنْ حَيْثُ لَا يَحْتَسِبُ

तर्जुमा: “और जो अल्लाह से डरता है (तक़वा इख़्तियार करता है), अल्लाह उसके लिए निकलने का रास्ता बना देता है और उसे ऐसी जगह से रिज़्क़ अता फ़रमाता है जहाँ से उसे गुमान भी नहीं होता।” (सूरह अत-तलाक़ : आयत 2-3)

वज़ाहत: अगर इंसान तक़वा इख़्तियार करे, गुनाहों से बचे और हर काम में अल्लाह के हुक्म को आगे रखे, तो अल्लाह तआला उसके लिए ऐसी जगहों से रिज़्क़ के दरवाज़े खोल देता है जिनके बारे में उसने कभी गुमान भी नहीं किया होगा।

सहीह हदीस में रिज़्क़ और क़र्ज़ के बारे में क्या आता है?

अल्लाह के रसूल ﷺ ने अपनी उम्मत की हर मोड़ पर रहनुमाई फ़रमाई है। सहीह अहादीस में रिज़्क़, बरकत और क़र्ज़ से निजात के बारे में ऐसी बहुत-सी दुआएँ और आमाल बताए गए हैं जो पूरी तरह मुस्तनद हैं।

1. सुबह के वक़्त रिज़्क़ और इल्म की दुआ

हज़रत उम्मे सलमा (रज़ि.) से रिवायत है कि नबी करीम ﷺ फ़ज्र की नमाज़ के बाद यह दुआ पढ़ा करते थे-

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ عِلْمًا نَافِعًا، وَرِزْقًا طَيِّبًا، وَعَمَلًا مُتَقَبَّلًا

तर्जुमा: “ऐ अल्लाह! मैं तुझसे नफ़ा देने वाला इल्म, पाकीज़ा (हलाल) रिज़्क़ और मक़बूल अमल का सवाल करता हूँ।”

हवाला: Sunan Ibn Majah (Hadith No. 925), Musnad Ahmad

हाफ़िज़ अल-बूसीरी (रह.) ने इसकी सनद को सहीह क़रार दिया है।

2. हलाल रिज़्क़ की अहमियत

नबी ﷺ ने उम्मत को हमेशा हलाल रिज़्क़ हासिल करने की तालीम दी। जो शख़्स अल्लाह से हलाल रिज़्क़ माँगता है और उसके लिए जायज़ असबाब इख़्तियार करता है, अल्लाह तआला उसकी ज़रूरतों को पूरा फ़रमाता है।

क़र्ज़ से निजात की सबसे मशहूर सहीह दुआ

अगर आप क़र्ज़ के बोझ तले दब चुके हैं और कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा, तो नबी करीम ﷺ की सिखाई हुई यह मुबारक दुआ ज़रूर पढ़ें। यह क़र्ज़ से निजात की सबसे मशहूर और मुस्तनद दुआओं में से एक है।

दुआ : اللَّهُمَّ اكْفِنِي بِحَلَالِكَ عَنْ حَرَامِكَ، وَأَغْنِئْنِي بِفَضْلِكَ عَمَّنْ سِوَاكَ

तर्जुमा: “ऐ अल्लाह! मुझे अपनी हलाल की हुई चीज़ों के ज़रिए हराम से काफ़ी कर दे, और अपने फ़ज़्ल से अपने सिवा हर एक से बेनियाज़ कर दे।”

हदीस का वाक़िआ

हज़रत अली (रज़ि.) के पास एक मुकातब ग़ुलाम आया जिसने अपने मालिक से आज़ाद होने के लिए माल अदा करने का मुआहदा किया था। उसने अर्ज़ किया कि वह अपना क़र्ज़ अदा नहीं कर पा रहा है।

हज़रत अली (रज़ि.) ने फ़रमाया-: “क्या मैं तुम्हें ऐसे कलिमात न सिखाऊँ जो मुझे रसूलुल्लाह ﷺ ने सिखाए थे? अगर तुम पर पहाड़ जितना भी क़र्ज़ हो, तो अल्लाह तआला उसे भी अदा कर देगा।” फिर आपने यही दुआ उसे सिखाई।

हवाला: Jami’ at-Tirmidhi (Hadith No. 3563)

इमाम तिर्मिज़ी (रह.) ने इस हदीस को हसन क़रार दिया है।

फ़ायदा : इस दुआ को हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद, ख़ुसूसन सज्दे में, तशह्हुद के दौरान और सुबह-शाम कसरत से पढ़ना चाहिए। यह अल्लाह से हलाल रिज़्क़ और क़र्ज़ से निजात माँगने की बेहतरीन दुआओं में से एक है।

सुबह और शाम पढ़ने वाली दुआ जो क़र्ज़ और परेशानी में मददगार है

हज़रत अबू सईद अल-ख़ुदरी (रज़ि.) से रिवायत है कि प्यारे नबी ﷺ ने एक अंसारी सहाबी को, जो बहुत परेशान और क़र्ज़दार थे, सुबह और शाम यह दुआ पढ़ने की ताकीद फ़रमाई—

اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْهَمِّ وَالْحَزَنِ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنَ الْعَجْزِ وَالْكَسَلِ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنَ الْجُبْنِ وَالْبُخْلِ، وَأَعُوذُ بِكَ مِنْ غَلَبَةِ الدَّيْنِ وَقَهْرِ الرِّجَالِ

तर्जुमा : “ऐ अल्लाह! मैं तेरी पनाह माँगता हूँ फ़िक्र और ग़म से। मैं तेरी पनाह माँगता हूँ कमज़ोरी और सुस्ती से। मैं तेरी पनाह माँगता हूँ बुज़दिली और बुख़्ल (कंजूसी) से। और मैं तेरी पनाह माँगता हूँ क़र्ज़ के ग़लबे और लोगों के ज़ुल्म से।” Sahih al-Bukhari (Hadith No. 2893)

वह सहाबी फ़रमाते हैं कि जब मैंने इस दुआ को अपनी ज़िंदगी का मामूल बना लिया, तो अल्लाह तआला ने मेरी परेशानियाँ भी दूर फ़रमा दीं और मेरा क़र्ज़ भी अदा हो गया।

रिज़्क़ में बरकत के लिए कुरआन और सुन्नत के आमाल

सिर्फ़ ज़ुबान से दुआ करना काफ़ी नहीं होता, बल्कि अपने आमाल को भी कुरआन और सुन्नत के मुताबिक़ बनाना ज़रूरी है। रिज़्क़ में बरकत उसी वक़्त आती है जब इंसान अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की तालीमात पर अमल करे।

1. सच्चा इस्तिग़फ़ार

जैसा कि सूरह नूह की आयतों में बयान हुआ, इस्तिग़फ़ार रिज़्क़ में बरकत का बहुत ही बड़ा ज़रिया है। रोज़ाना कम से कम 100 मरतबा “अस्तग़फ़िरुल्लाह” पढ़ने की आदत बनाइए। इससे आपकी दुनिया भी और आख़िरत भी सँवर जाएगी इंशाल्लाह।

2. तक़वा इख़्तियार करना

गुनाहों से बचना हर एक मोमिन के लिए जरूरी है, हर काम में अल्लाह के हुक्म को आगे रखना और उसकी नाफ़रमानी से दूर रहना ही तक़वा है। जो शख़्स तक़वा इख़्तियार करता है, अल्लाह उसके लिए वहाँ से भी रिज़्क़ के रास्ते खोल देता है जहाँ से उसे कोई उम्मीद नहीं होती।

3. तवक्कुल (अल्लाह पर मुकम्मल भरोसा)

नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया– “अगर तुम अल्लाह पर वैसा ही तवक्कुल करो जैसा करने का हक़ है, तो अल्लाह तुम्हें उसी तरह रिज़्क़ देगा जैसे परिंदों को देता है। वे सुबह ख़ाली पेट निकलते हैं और शाम को पेट भरकर लौटते हैं।”

(Sunan at-Tirmidhi: 2344 – Sahih)

4. सिलह-रहमी (रिश्तेदारों के साथ अच्छा सुलूक)

रिज़्क़ में बरकत हासिल करने के सबसे अहम आमाल में से एक सिलह-रहमी है, यानी अपने रिश्तेदारों के साथ अच्छा सुलूक करना और रिश्तों को जोड़े रखना।

नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया– “जो शख़्स चाहता है कि उसके रिज़्क़ में इज़ाफ़ा हो और उसकी उम्र में बरकत हो, उसे चाहिए कि वह सिलह-रहमी करे।”

(सहीह अल-बुख़ारी : 2067)

इस हदीस से मालूम होता है कि रिश्तेदारों के साथ अच्छा बर्ताव सिर्फ़ अख़लाक़ी फ़र्ज़ ही नहीं, बल्कि रिज़्क़ में बरकत का भी एक अहम और अनमोल ज़रिया है।

5. सदक़ा देना

यह बात हमेशा याद रखना, अल्लाह की राह में ख़र्च करना कभी भी माल को कम नहीं करता, बल्कि उसमें बरकत पैदा करता है।

अल्लाह रब्बुल इज्जत फ़रमाता है– “जो कुछ तुम अल्लाह की राह में ख़र्च करोगे, अल्लाह उसका बदला देगा, और वही सबसे बेहतर रिज़्क़ देने वाला है।” (सूरह सबा : आयत 39)

अगर इंसान अपनी हैसियत के मुताबिक़ थोड़ा ही सही, लेकिन हमेशा सदक़ा देता रहे, तो अल्लाह तआला उसके माल में ऐसी बरकत अता फ़रमाता है जिसका अंदाज़ा इंसान कभी भी ख़ुद नहीं लगा सकता।

6. नमाज़ की पाबंदी और शुक्र

पाँच वक़्त की फ़र्ज़ नमाज़ की पाबंदी हर मुसलमान पर ज़रूरी है। नमाज़ इंसान को अल्लाह के क़रीब करती है और उसके दिल में एक अलग ही तरह का सुकून पैदा करती है।इसी तरह अल्लाह तआला ने जो नेमतें अता फ़रमाई हैं, उन पर हमेशा शुक्र अदा करना चाहिए।

अल्लाह तआला का वादा है– “अगर तुम शुक्र अदा करोगे, तो मैं तुम्हें और ज़्यादा दूँगा।” (सूरह इब्राहीम : आयत 7)

अगर आप रोजाना तहज्जुद नमाज़ पढ़ते है और उसकी बरकत से होने वाले फायदे या सही पढ़ने का तरीका जानना है तो हमारे इस आर्टिकल को पढ़े “नमाज़-ए-तहज्जुद पढ़ने का सही तरीका और इसकी फ़ज़ीलत“, इंशाल्लाह बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।

किन गुनाहों की वजह से रिज़्क़ में कमी आ सकती है?

कई बार इंसान ख़ुद अपने गुनाहों की वजह से रिज़्क़ की बरकत से महरूम हो जाता है। इसलिए सिर्फ़ दुआ करना ही काफ़ी नहीं, बल्कि गुनाहों से बचना भी उतना ही ज़रूरी है।

1. सूद

सूद लेना, देना या उसके कारोबार में शामिल होना बहुत बड़ा गुनाह है। “अल्लाह तआला ने सूद खाने वालों के बारे में सख़्त चेतावनी देते हुए फ़रमाया है कि यह अल्लाह और उसके रसूल ﷺ के ख़िलाफ़ जंग का एलान है।” (सूरह अल-बक़रह : 279)

ज़ाहिरी तौर पर सूद से माल बढ़ता हुआ दिखाई देता है, लेकिन उसकी बरकत पूरी तरह ख़त्म हो जाती है।

2. धोखा और झूठ

कारोबार में झूठ बोलना, धोखा देना, नाप-तौल में कमी करना या लोगों का हक़ मारना, रिज़्क़ से बरकत को ख़त्म कर देता है। हलाल कमाई वही है जिसमें अमानतदारी और सच्चाई हो।

3. रिश्तेदारों से ताल्लुक़ तोड़ना

जो लोग अपने रिश्तेदारों से माल दौलत या हसद की वजह से तअल्लुक़ खत्म कर लेते हैं, उनके रिज़्क़ में भी तंगी आ सकती है। इसलिए हमेशा रिश्तों को निभाने की कोशिश करनी चाहिए, चाहे सामने वाला कमज़ोर पड़ जाए।

4. नाशुक्री करना

हर वक़्त अपनी क़िस्मत का रोना धोना, अल्लाह की नेमतों की क़द्र न करना और हमेशा शिकायत करते ही रहना भी ,बरकत कम होने का एक बड़ा सबब बन सकता है। जबकि एक सच्चे मोमिन की पहचान यह है कि वह हर हाल में अपने रब का शुक्र अदा करता है।

लोग रिज़्क़ के लिए जो ग़लतियाँ करते हैं

आजकल बहुत से लोग रिज़्क़ बढ़ाने के नाम पर ऐसे तरीक़े अपनाते हैं जिनका कुरआन और सहीह सुन्नत से कोई ताल्लुक़ नहीं होता। एक मुसलमान को इन चीज़ों से बचना चाहिए।

1. फ़र्ज़ी वज़ीफ़े और मनगढ़ंत गिनती

सोशल मीडिया पर अक्सर ऐसे मैसेज वायरल होते हैं—

  • यह दुआ 786 बार पढ़िए।
  • फलाँ नाम 1100 बार पढ़िए।
  • फलाँ रात 41 बार यह अमल कीजिए।

अगर किसी ख़ास गिनती की दलील सहीह हदीस से साबित नहीं है, तो उसे दीन का हिस्सा समझकर अपनाना सही नहीं है।

2. तावीज़ और धागे

रिज़्क़ बढ़ाने के लिए तावीज़ लटकाना, धागे बाँधना या ऐसी चीज़ों पर भरोसा करना दुरुस्त नहीं है। रिज़्क़ देने वाला सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह तआला है। इसलिए इंसान को अपना भरोसा सिर्फ़ उसी पर रखना चाहिए।

3. हराम कमाई के साथ दुआ करना

अगर कोई शख़्स रिश्वत, सूद, धोखे या हराम कमाई से माल जमा कर रहा है, तो उसकी दुआ की क़ुबूलियत भी मुतास्सिर होती है।

“नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया कि जिस जिस्म की परवरिश हराम से हुई हो, उसकी दुआ कैसे क़ुबूल होगी।” (सहीह मुस्लिम : 1015)

इसलिए दुआ के साथ-साथ अपनी कमाई का हलाल होना भी बेहद ज़रूरी है।

क्या सिर्फ़ दुआ करना काफ़ी है?

इस्लाम एक अमली दीन है। यह हमें कभी नहीं सिखाता कि इंसान काम-काज छोड़कर सिर्फ़ दुआ करता रहे। हज़रत उमर (रज़ि.) ने कुछ लोगों को देखा जो मेहनत नहीं करते थे और कहते थे कि हम अल्लाह पर तवक्कुल करते हैं।

उन्होंने उन्हें नसीहत करते हुए फ़रमाया– “तुम में से कोई भी रिज़्क़ की तलाश छोड़कर सिर्फ़ यह न कहे कि ऐ अल्लाह! मुझे रिज़्क़ दे। क्योंकि तुम जानते हो कि आसमान से सोना और चाँदी नहीं बरसते।”

यानी हर एक मुसलमान का यह तरीक़ा होना चाहिए कि पहले वह हलाल रोज़ी के लिए पूरी मेहनत करे, जायज़ असबाब इख़्तियार करे, फिर नतीजा अल्लाह पर छोड़ दे यही असल तवक्कुल है। इसके साथ-साथ इंसान को रिज़्क़ में बरकत और क़र्ज़ से निजात की दुआ भी लगातार माँगते रहना चाहिए।

रिज़्क़ में बरकत के लिए डेली रूटीन

अगर आप चाहते हैं कि आपके रिज़्क़ में बरकत हो, क़र्ज़ आसानी से अदा हो और ज़िंदगी में सुकून आए, तो नीचे दिया गया आसान रूटीन अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बना सकते हैं।

सुबह का रूटीन

फ़ज्र की नमाज़– फ़ज्र की नमाज़ सही वक़्त पर अदा करें। दिन की शुरुआत अल्लाह की इबादत से करने में ही बरकत है।

सुबह की दुआ

फ़ज्र के बाद यह दुआ पढ़ें– “Allahumma inni as’aluka ‘ilman nafi’an, wa rizqan tayyiban, wa ‘amalan mutaqabbalan.”

इस्तिग़फ़ार– कम से कम 100 मरतबा “अस्तग़फ़िरुल्लाह” पढ़ने की आदत बनाइए।

हलाल रोज़ी की नीयत– अपने काम पर निकलते समय “बिस्मिल्लाह” जरूर पढ़ें और पूरी ईमानदारी के साथ अपना फ़र्ज़ अदा करें।

शाम का रूटीन

नमाज़ की पाबंदी– मग़रिब और इशा की नमाज़ वक़्त पर अदा करें।

क़र्ज़ से निजात की दुआ– शाम के वक़्त और हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद यह दुआ जरूर पढ़ें करे। अल्लाह इस दुआ के जरिए आप सभी के कर्ज से निजात देगा—

“Allahummak-finee bi-halalika ‘an haramika, wa aghninee bi-fadlika ‘amman siwaka.”

सदक़ा– अगर मुमकिन हो, तो रोज़ाना या अक्सर अल्लाह की राह में कुछ न कुछ सदक़ा ज़रूर देते रहना चाहिए। चाहे वह थोड़ा ही क्यों न हो।

शुक्र और दुआ– सोने से पहले पूरे दिन में मिली नेमतों पर अल्लाह का हर हाल के शुक्र अदा करें और अपने गुनाहों की माफ़ी माँगें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Que1. रिज़्क़ की सबसे अफ़ज़ल दुआ कौन-सी है?
Ans. रिज़्क़ के लिए सबसे अफ़ज़ल और मुस्तनद दुआ वह है जो नबी करीम ﷺ फ़ज्र की नमाज़ के बाद पढ़ते थे—

“Allahumma inni as’aluka ‘ilman nafi’an, wa rizqan tayyiban, wa ‘amalan mutaqabbalan.”

इसके साथ सच्चा इस्तिग़फ़ार करना भी रिज़्क़ में बरकत का बहुत बड़ा ज़रिया है।

Que2. क़र्ज़ से जल्दी निजात कैसे मिले?
Ans. अगर आप क़र्ज़ से परेशान हैं, तो इन बातों का ख़ास ख़याल रखें—

  • क़र्ज़ अदा करने की सच्ची नीयत रखें।
  • फ़िज़ूल ख़र्ची से बचें।
  • हलाल कमाई की कोशिश जारी रखें।
  • हज़रत अली (रज़ि.) वाली दुआ हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद और सज्दे में पढ़ें।
  • अल्लाह पर मुकम्मल तवक्कुल रखें।

Que3. दुआ कितनी बार पढ़नी चाहिए?
Ans. किसी भी दुआ की कोई ख़ास तादाद सहीह हदीस से साबित नहीं है, उसे आप अपनी सहूलत के मुताबिक़ जितनी बार चाहें पढ़ सकते हैं। लेकिन 41, 313, 786 या 1100 जैसी गिनतियों को दीन का हिस्सा समझना, जबकि उसकी कोई सहीह दलील मौजूद न हो, दुरुस्त नहीं है।

Que4. क्या सिर्फ़ वज़ीफ़ा पढ़ने से क़र्ज़ उतर जाता है?
Ans. नहीं।
इस्लाम सिर्फ़ वज़ीफ़ा पढ़ने की तालीम नहीं देता, बल्कि मेहनत करने, हलाल रोज़ी तलाश करने और जायज़ असबाब इख़्तियार करने का भी हुक्म देता है। दुआ और मेहनत—दोनों साथ-साथ ज़रूरी हैं।

Que5. क्या तहज्जुद रिज़्क़ बढ़ाने का ज़रिया है?
Ans. जी हाँ। तहज्जुद की नमाज़ अल्लाह से क़ुर्ब हासिल करने का एक बहुत ही बेहतरीन ज़रिया है। रात के आख़िरी हिस्से में अल्लाह तआला आसमान-ए-दुनिया पर नुज़ूल फ़रमाता है और फ़रमाता है—

“है कोई मुझसे माँगने वाला, ताकि मैं उसे अता करूँ?”

इसलिए तहज्जुद का वक़्त दुआ की क़ुबूलियत और रिज़्क़ में बरकत माँगने के लिए बेहद अफ़ज़ल वक़्त है।

Que6. क्या सदक़ा देने से रिज़्क़ में बरकत होती है?
Ans. जी हाँ, बिल्कुल।

नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया– “सदक़ा देने से माल कम नहीं होता।” (सहीह मुस्लिम)

Que7. क्या हर दुआ अरबी में ही पढ़ना ज़रूरी है?
Ans. नमाज़ के अंदर पढ़ी जाने वाली दुआएँ अरबी में होना ज़रूरी है। लेकिन नमाज़ के बाहर आप अपनी ज़ुबान—उर्दू, हिन्दी या अंग्रेज़ी—में भी अल्लाह से अपनी मुश्किलात बयान कर सकते हैं। जबकि हमारा अल्लाह हमारी हर एक ज़ुबान को जानता है और अपने बंदों की हर दुआ सुनता है।

Que8. अगर दुआ के बाद भी रिज़्क़ में तंगी रहे तो क्या करें?
Ans. अगर दुआ और सही आमाल के बावजूद रिज़्क़ में तंगी रहे, तो मायूस बिल्कुल न हों। हो सकता है कि यह अल्लाह की तरफ़ से एक आपकी आज़माइश हो।

मोमिन का काम सब्र करना, दुआ करते रहना और अल्लाह पर तवक्कुल बनाए रखना है।

यक़ीन रखिए– हर मुश्किल के बाद आसानी है।

ख़ुलासा (Conclusion)

रिज़्क़ की तंगी और क़र्ज़ की परेशानी इंसान को अंदर से तोड़ सकती है, लेकिन एक सच्चा मोमिन कभी मायूस नहीं होता। उसे यक़ीन होता है कि रिज़्क़ का असल मालिक सिर्फ़ अल्लाह सुब्हानहु व तआला है।

अगर आप चाहते हैं कि रिज़्क़ में बरकत और क़र्ज़ से निजात की दुआ क़ुबूल हो, तो अपनी ज़िंदगी में इन बातों को ज़रूर अपनाइए—

  • पाँच वक़्त की फ़र्ज़ नमाज़ की पाबंदी जरूर करें।
  • सिर्फ़ हलाल कमाई इख़्तियार करें और हराम से बचें।
  • कसरत से इस्तिग़फ़ार और अल्लाह का शुक्र अदा करें।
  • हज़रत अली (रज़ि.) की सिखाई हुई मुस्तनद दुआ को अपना मामूल बना लें।
  • जब तक जिंदा हो सदक़ा देने की आदत बना लें।
  • रिश्तेदारों के साथ हमेशा अच्छा सुलूक करें।
  • और हर हाल में अल्लाह पर मुकम्मल तवक्कुल रखें।

जब इंसान, अल्लाह के बताए हुए रास्ते पर चलता है, तो अल्लाह तआला उसके लिए ऐसी जगहों से रिज़्क़ के दरवाज़े खोल देता है जहाँ से उसे गुमान भी नहीं होता।

अल्लाह तआला हम सबको हलाल और बा-बरकत रिज़्क़ अता फ़रमाए, हर तरह के क़र्ज़, फ़िक्र और परेशानियों से निजात अता फ़रमाए, और हमें हमेशा अपने दीन पर क़ायम रखे। आमीन।

Mohammad Naushad

अस्सलामु अलैकुम! मेरा नाम मौहम्मद नौशाद है और मैं Deen Ki Roshni का फ़ाउंडर हूँ। मैं क़ुरआन, सहीह हदीस और भरोसेमंद इस्लामी किताबों की रोशनी में आसान हिंदी में इस्लामी मालूमात आप तक पहुँचाने की कोशिश करता हूँ। अगर मेरे लिखे हुए लेखों से किसी एक इंसान को भी दीन की सही समझ हासिल हो जाए, तो मैं इसे अपने लिए अल्लाह की बड़ी नेमत समझता हूँ।

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