मुहर्रम के बाद क्या आता है या अरबईन क्या है? यह सवाल मुहर्रम और सफ़र के महीने में लाखों लोग गूगल पर सर्च करते हैं, क्योंकि सभी जानना चाहते हैं कि इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) की शहादत के 40 दिन बाद क्या हुआ था, जिसकी याद में आज भी पूरी दुनिया इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) को याद करती है।
अरबईन कोई तारीखी दिन नहीं है, बल्कि यह कर्बला के पैग़ाम को ज़िंदा रखने का नाम है। इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने कर्बला)में हक़, सच, सब्र, इंसाफ़ और दीन-ए-इस्लाम की हिफ़ाज़त के लिए ख़ुद शहीद हो गए। उनकी शहादत के 40 दिन बाद जो वाक़ियात पेश आए, उन्होंने तारीख़ का रुख़ ही बदल दिया।
नवासा-ए-रसूल हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) और उनके 72 जान-निसारों की शहादत के ठीक 40 दिन बाद मनाए जाने वाले इस दिन का तअल्लुक़ सिर्फ़ रोने या ग़म मनाने से नहीं, बल्कि ज़ुल्म के ख़िलाफ़ उस अज़ीम लड़ाई की याद को ज़िंदा रखने से है, जिसे तारीख़ “Karbala Ki Kahani“ के नाम से जानती है। हर साल मुहर्रम के बाद सफ़र के महीने की 20 तारीख़ को दुनिया भर से करोड़ों लोग इराक़ के शहर (कर्बला) की सरज़मीन पर पहुँचते हैं।
लेकिन सवाल यह उठता है कि शहादत के 40 दिन बाद आख़िर ऐसा क्या हुआ था, जिसके चलते यह दिन एक अज़ीम historical movement बन गया? इसको समझने के लिए हमें मुहर्रम की उन सुर्ख़ तारीख़ों और यज़ीद के उस दौर-ए-हुकूमत को देखना होगा, जहाँ से इस पूरी दास्तान की शुरुआत हुई थी।
कर्बला की कहानी Part 1: मुहर्रम और आशूरा का पस-ए-मंज़र
कर्बला की दास्तान को पूरी तरह समझने के लिए आपको Karbala Ki Kahani Part 1 पर नज़र डालनी होगी, जहाँ हमने इसको बहुत अच्छे से समझाया है, जो 61 हिजरी (680 AD) की शुरुआत से जुड़ी है। जब सवाल आता है कि मुहर्रम कब है या इसकी शुरुआत कैसे हुई, तो यह सिर्फ़ एक नए इस्लामी साल का आग़ाज़ नहीं है, बल्कि यह 61 हिजरी का वह दौर था, जब इस्लाम को बचाने के लिए एक बहुत बड़ी क़ुर्बानी दी जाने वाली थी।
जैसे ही हज़रत मुआविया (रज़ियल्लाहु अन्हु) का इंतिक़ाल हुआ, उसके फ़ौरन बाद उनके बेटे यज़ीद ने ख़ुद को मुसलमानों का ख़लीफ़ा घोषित कर दिया। Yazid Kaun Tha? यज़ीद एक ऐसा शख़्स था, जिसका किरदार इस्लाम के बिल्कुल ख़िलाफ़ था। वह चाहता था कि हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) उसकी हुकूमत और उसके ग़लत किरदार पर अपनी मुहर लगाएँ यानी उसकी बैअत करें। Hazrat Imam (R.A) ने बैअत को ठुकरा दिया और फ़रमाया कि मुझ जैसा इंसान, यज़ीद जैसे बद-किरदार की बैअत हरगिज़ नहीं कर सकता।
इसी इनकार के बाद इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) को मदीना छोड़ना पड़ा और आख़िरकार 2 मुहर्रम को वह अपने ख़ानदान और साथियों के साथ इराक़ के तपते हुए रेगिस्तान कर्बला में घेर लिए गए। 7 मुहर्रम को उनका पानी बंद कर दिया गया और 10 मुहर्रम यानी आशूरा के दिन मैदान-ए-कर्बला में वह दर्दनाक वाक़िया हुआ, जहाँ इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) और उनके मासूम बच्चों व वफ़ादार साथियों को निहायत बेदर्दी के साथ शहीद कर दिया गया। यह Imam Hussain Story का वह पहला हिस्सा है, जो इंसानियत को झिंझोड़ कर रख देता है।
अरबईन क्या है? शहादत के 40 दिन बाद क्या हुआ था?
अरबईन एक अरबी लफ़्ज़ है, जिसका मतलब होता है “चालीस” (40)। किसी भी मरने वाले के इंतिक़ाल के 40 दिन बाद जो ताज़िया या फ़ातिहा होती है, उसे उर्फ़ी ज़बान में ‘चेहलुम’ कहा जाता है।
10 मुहर्रम को शहादत के बाद, यज़ीद की फ़ौज ने अहल-ए-बैत की ख़वातीन और बच्चों, जिनमें हज़रत इमाम ज़ैनुल आबिदीन (रज़ियल्लाहु अन्हु) और हज़रत बीबी ज़ैनब (रज़ियल्लाहु अन्हा) शामिल थे, उन सभी को क़ैदी बना लिया और उन्हें पहले कूफ़ा और फिर दमिश्क (शाम) के दरबार में लाया गया। सदियों पुरानी रिवायत के मुताबिक़, जब इन पाक हस्तियों को क़ैद से रिहाई मिली, तो वह सभी मदीना जाते वक़्त कर्बला के मैदान में ठीक 20 सफ़र को पहुँचे। यानी हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) और तमाम शुहदा के शहीद होने के बाद यह 40वाँ दिन था, इसलिए इसको अरबईन या चेहलुम कहा जाता है।
पहला अरबईन और सहाबी-ए-रसूल का पहुँचना
ठीक उसी दिन, अल्लाह के रसूल ﷺ के एक अज़ीम सहाबी हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह अल-अंसारी (रज़ियल्लाहु अन्हु) भी इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) की क़ब्र-ए-मुबारक की ज़ियारत के लिए मदीना से कर्बला पहुँचे थे। वह पहले सहाबी थे, जिन्होंने सबसे पहले इमाम की क़ब्र पर ग़म-ए-हुसैन में हाज़िरी दी थी। जब एक तरफ़ से सहाबी-ए-रसूल और दूसरी तरफ़ से क़ैद से रिहा होकर आया अहल-ए-बैत का काफ़िला कर्बला में मिला, तो वहाँ एक कोहराम-सा पैदा हो गया। यह तारीख़ का पहला अरबईन था, जहाँ से शहादत के 40 दिन बाद ग़म को एक नई ताक़त मिली और दुनिया ने जाना कि जीत तलवार की नहीं, बल्कि ख़ून-ए-हुसैन की हुई थी।
क़ुरआन और हदीस का हवाला
इस्लाम में शुहदा और ख़ासकर अहल-ए-बैत की मुहब्बत को लेकर बहुत वाज़ेह हिदायतें हैं। (क़ुरआन) करीम में सूरह अश-शूरा (आयत 23) में अल्लाह तआला फ़रमाता है:
“आप फ़रमा दीजिए कि मैं इस (तबलीग़-ए-दीन) पर तुमसे कोई उजरत (बदला) नहीं माँगता, सिवाए इसके कि मेरे अहल-ए-बैत से मुहब्बत करो।”
इसी तरह, अल्लाह के प्यारे रसूल हज़रत मुहम्मद ﷺ ने इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) की अहमियत को लेकर बहुत जगह इरशाद फ़रमाया है। सुनन अत-तिर्मिज़ी की एक मशहूर हदीस है, जहाँ आप ﷺ ने फ़रमाया:
“हुसैन मुझ से है और मैं हुसैन से हूँ। अल्लाह उस शख़्स से मुहब्बत फ़रमाता है, जो हुसैन से मुहब्बत करता है।” (Sunan At-Tirmidhi, Hadees: 3775)
इसलिए ही (अरबईन) का यह दिन इसी क़ुरआनी हुक्म और हदीस-ए-नबवी पर अमल करने का एक ज़रिया है, जहाँ पूरी दुनिया के मुसलमान उन पाक हस्तियों से अपनी अकीदत का इज़हार करते हैं, जिन्होंने दीन की ख़ातिर अपना सब कुछ क़ुर्बान कर दिया।
अरबईन वॉक (Arbaeen Walk) मशाय: दुनिया का सबसे बड़ा सफ़ीर
आज के दौर में (अरबईन) की पहचान “Arbaeen Walk” (मशाय) से है। नजफ़ (हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु का रोज़ा) से लेकर (कर्बला) (इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु का रोज़ा) तक लगभग 80 किलोमीटर का रास्ता है, जिसे लोग पैदल चलकर पूरा करते हैं।
बिना किसी VVIP वजह के सैलाब: इस पैदल यात्रा में बच्चे, बुज़ुर्ग, ख़वातीन और हर मज़हब-ओ-मिल्लत के लोग शामिल होते हैं।
मेहमान-नवाज़ी का अनोखा मंज़र: पूरे 80 KM के रास्ते में इराक़ के रहने वाले स्थानीय लोग पैदल चलने वालों के लिए मुफ़्त खाना, दवा, रहने की जगह और यहाँ तक कि पैर दबाने तक की सेवा मुफ़्त करते हैं। वह इसे इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) के मेहमानों की ख़िदमत समझते हैं।
Arbaeen की अहमियत क्या है?
अरबईन की अहमियत सिर्फ़ ग़म मनाने तक महदूद नहीं है।
यह दिन मुसलमानों को याद दिलाता है कि:
- हक़ के लिए क़ुर्बानी देनी पड़ सकती है।
- ज़ुल्म के सामने ख़ामोश रहना मुनासिब नहीं।
- दीन की हिफ़ाज़त के लिए सब्र और इस्तिक़ामत ज़रूरी है।
- अल्लाह के रास्ते में दी गई क़ुर्बानी कभी ज़ाया नहीं होती।
- इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) का पैग़ाम आज भी इंसाफ़, सच्चाई और ईमान की मिसाल है।
FAQ
Q1. अरबईन और आशूरा में क्या फ़र्क़ है?
Ans. आशूरा 10 मुहर्रम वह दिन है, जब हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) और उनके साथियों को कर्बला के मैदान में शहीद किया गया था। जबकि अरबईन 20 सफ़र उनकी शहादत के ठीक 40 दिन बाद का दिन है, जब उनके परिवार के बचे हुए सदस्य क़ैद से रिहा होकर वापस कर्बला आए थे।
Q2. Arbaeen किस महीने में और कब आता है?
Ans. अरबईन इस्लामी कैलेंडर के दूसरे महीने सफ़र की 20 तारीख़ को आता है। यह अंग्रेज़ी कैलेंडर के मुताबिक़ हर साल लगभग 10 से 11 दिन पहले सरकता है।
Q3. यज़ीद कौन था और उसने इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) को क्यों शहीद करवाया?
Ans. यज़ीद, हज़रत अमीर मुआविया (रज़ियल्लाहु अन्हु) का बेटा था, जिसने 61 हिजरी में ख़ुद को ज़बरदस्ती मुसलमानों का ख़लीफ़ा बनाया था। वह बद-किरदार और ज़ालिम था। वह चाहता था कि इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) उसकी हुकूमत को सही तस्लीम करें। जब इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने इनकार किया, तो यज़ीद ने उन्हें कर्बला में शहीद करवा दिया।
Q4. क्या अरबईन में सिर्फ़ शिया मुसलमान ही जाते हैं?
Ans. नहीं, अरबईन में शिया मुसलमानों के साथ-साथ सुन्नी मुसलमान, ईसाई (Christians), हिन्दू और दुनिया भर के इंसानियत-पसंद लोग शामिल होते हैं, क्योंकि इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) की क़ुर्बानी किसी एक फ़िर्क़े के लिए नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत और हक़ के लिए थी।
Que5. चेहलुम कब है और यह क्यों मनाया जाता है?
Ans. चेहलुम जिसे (अरबईन भी कहा जाता है) हर साल इस्लामी कैलेंडर के मुताबिक़ सफ़र की 20 तारीख़ को मनाया जाता है। यह दिन हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) और उनके साथियों की शहादत के ठीक 40 दिन बाद आता है। इसलिए इसे उर्फ़ी ज़बान में ‘चेहलुम’ (यानी चालीसवाँ) कहा जाता है। हर साल इसकी तारीख़ अंग्रेज़ी कैलेंडर के हिसाब से बदलती रहती है।
Conclusion
अरबईन सिर्फ़ एक तारीख़ या रस्म का नाम नहीं है, बल्कि यह कर्बला के उस पैग़ाम को ज़िंदा रखने का ज़रिया है, जिसने पूरी इंसानियत को हक़, सब्र, इस्तिक़ामत और इंसाफ़ का रास्ता दिखाया। इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) और उनके वफ़ादार साथियों की क़ुर्बानी आज भी दुनिया भर के लोगों के लिए हिम्मत और ईमान की मिसाल है।
तमाम तारीफ़ अल्लाह के लिए है, जो तमाम जहानों का रब है। दरूद व सलाम हो हमारे प्यारे नबी मुहम्मद ﷺ, उनकी पाक आल और उनके सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) पर। अल्लाह तआला हमें कर्बला के पैग़ाम को समझने, हक़ पर क़ायम रहने और दीन की ख़ातिर सब्र व इस्तिक़ामत अपनाने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।






