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हज़रत मुहम्मद ﷺ की पूरी ज़िंदगी | जन्म से वफ़ात तक सीरत-ए-नबी

जब हम हज़रत मुहम्मद ﷺ की पूरी ज़िंदगी (Prophet Muhammad Biography) के बारे में पढ़ते हैं, तो हमारे सामने सिर्फ़ एक अज़ीम इंसान की कहानी नहीं आती, बल्कि उस नबी की ज़िंदगी आती है जिसे अल्लाह तआला ने पूरी इंसानियत के लिए दुनिया में रहनुमा बनाकर भेजा। कुरआन कहता है कि रसूलुल्लाह ﷺ में हमारे लिए बेहतरीन नमूना है। — सूरह अल-अहज़ाब, 33:21

इसलिए आइए, आज सीरत-ए-नबी ﷺ (Seerat un Nabi) को किसी भी मुश्किल किताब की तरह नहीं, बल्कि एक खूबसूरत किस्से की तरह समझते हैं – मक्का की गलियों से लेकर मदीना की रौनक तक और फिर उस आख़िरी सफ़र तक, जब दुनिया से हम सभी के प्यारे रसूलुल्लाह ﷺ का विसाल हुआ।

Table of Contents

मक्का की सरज़मीन पर एक मुबारक पैदाइश

मक्का में कुरैश के खानदान में हज़रत मुहम्मद ﷺ की पैदाइश हुई। आपके वालिद साहब का नाम अब्दुल्लाह और वालिदा का नाम हज़रत आमिना रज़ियल्लाहु अन्हु था। आपकी पैदाइश आमुल-फ़ील (Year of the Elephant) के आसपास हुई, जिसे आम तौर पर लगभग 570 ईस्वी के करीब माना जाता है।

आपके जन्म की तारीख़ के बारे में सीरत की किताबों में अलग-अलग रिवायतें मिलती हैं, इसलिए 12 रबीउल अव्वल को यक़ीनी तारीख़ के रूप में लिखना मुनासिब नहीं। इतना तय है कि आपकी पैदाइश मक्का में हुई और आप अरब के एक मुअज़्ज़ज़ खानदान बनू हाशिम से थे। लेकिन शायद सबसे ज्यादा दर्दनाक बात यह थी कि आपके वालिद अब्दुल्लाह आपकी पैदाइश से पहले ही इंतिकाल कर चुके थे। यानी दुनिया में आने से पहले ही यतीमी का साया आपके साथ था।

Eid Milad-un-Nabi ﷺ की अहमियत और इस मुबारक मौके से जुड़ी जानकारी हमने अपने अलग लेख में विस्तार से बताई है।

बचपन और हज़रत हलीमा सादिया रज़ियल्लाहु अन्हु

अरब के उस दौर में मक्का के बच्चों को कुछ वक़्त के लिए देहाती इलाक़े में दूध पिलाने वाली माँओं के पास भेजने का रिवाज था। बचपन में हज़ूर को हज़रत हलीमा सादिया रज़ियल्लाहु अन्हु ने दूध पिलाया। आपने अपना शुरुआती बचपन उनके साथ बिताया और फिर अपनी वालिदा हज़रत आमिना रज़ियल्लाहु अन्हु के पास लौट आए। लेकिन बचपन ही में एक और बड़ा सदमा आपका इंतज़ार कर रहा था।

जैसे ही आप ﷺ की उम्र ए मुबारक लगभग छह साल थी, आपकी वालिदा हज़रत आमिना रज़ियल्लाहु अन्हु का भी इंतिकाल हो गया। इसके बाद आपके दादा अब्दुल मुत्तलिब ने आपकी परवरिश की। कुछ समय बाद उनके इंतिकाल के बाद आपके चचा अबू तालिब ने आपको अपनी सरपरस्ती में लिया। इस तरह बचपन से ही हमारे नबी ने ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव बहुत करीब से देखे।

जवानी: एक ऐसा किरदार जिस पर लोग भरोसा करते थे

जैसे-जैसे हुज़ूर बड़े हुए, आपकी सच्चाई और अमानतदारी लोगों के सामने साफ होती गई। मक्का के लोग आपको अस-सादिक़ और अल-अमीन (Al-Ameen) कहकर पुकारते थे। आपने कारोबार भी किया और अपनी ईमानदारी की वजह से लोगों के बीच भरोसे की एक खास जगह बनाई। यही वह दौर था जब आपकी मुलाकात हज़रत ख़दीजा रज़ियल्लाहु अन्हु से हुई। हज़रत ख़दीजा एक मुहतरम और कारोबारी ख़ातून थीं। उन्होंने नबी को अपने कारोबार के सिलसिले में काम दिया।

आपकी सच्चाई और अमानतदारी से मुतअस्सिर होकर हज़रत ख़दीजा ने आप ﷺ से निकाह किया। उस समय नबी करीम की उम्र लगभग 25 साल थी। यह रिश्ता आपकी ज़िंदगी का एक बेहद खूबसूरत हिस्सा बना।

काबा की तामीर और हज़ूर ﷺ का समझदारी भरा फैसला

हमारे नबी की नुबूवत से पहले मक्का में काबा की तामीर/मरम्मत का काम हुआ। काबा की तामीर और उससे जुड़ी हज़रत इब्राहीम عليه السلام की ज़िंदगी के बारे में हमने अपने अलग लेख में विस्तार से बताया है।

जब हजर-ए-अस्वद को उसकी जगह रखने का वक़्त आया तो अलग-अलग कबीलों के बीच इस बात को लेकर इख़्तिलाफ़ हो गया कि यह सम्मान किसे मिलेगा। मामला इतना बढ़ा कि लड़ाई का खतरा पैदा हो गया। तब लोगों ने हज़ूर को फैसला करने के लिए चुना। आपने एक चादर मंगवाई, हजर-ए-अस्वद को उसमें रखा और हर कबीले के एक शख़्स को चादर का एक किनारा पकड़ने को कहा। फिर जब पत्थर अपनी जगह के करीब पहुँचा तो आपने उसे अपने हाथों से उसकी जगह रख दिया। इस तरह एक बड़ा विवाद बिना खून-खराबे के खत्म हो गया।

40 साल की उम्र और पहली वह्य

फिर वह रात आई जिसने पूरी इंसानियत की तारीख़ बदल दी। नबी करीम को तन्हाई पसंद आने लगी थी। आप ग़ार-ए-हिरा में जाकर अपने रब की इबादत और गौर-ओ-फिक्र करते थे। फिर एक दिन हज़रत जिबरील अलैहिस्सलाम अल्लाह का पैग़ाम लेकर आए और फरमाया: “इक़रा” – पढ़िए। यहीं से नुबूवत और वह्य का सिलसिला शुरू हुआ।

सहीह बुखारी में हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हु से पहली वह्य का यह पूरा वाक़िया सुनाया। नबी उस तजुर्बे के बाद घर लौटे और फरमाया कि मुझे ढक दो। हज़रत ख़दीजा रज़ियल्लाहु अन्हा ने आपको तसल्ली दी और आपके साथ खड़ी रहीं। फिर वहक़ा बिन नौफ़ल से मुलाकात हुई, जिन्होंने उस वाक़िया को नुबूवत की शुरुआत के तौर पर समझा।

मक्का में इस्लाम की दावत

अब नबी ए करीम ने लोगों को एक अल्लाह की इबादत की तरफ़ बुलाना शुरू किया। शुरुआत में कुछ करीबी लोग ईमान लाए। हज़रत ख़दीजा रज़ियल्लाहु अन्हा, हज़रत अबू बक्र, हज़रत अली और हज़रत ज़ैद बिन हारिसा शुरुआती मुसलमानों में शामिल थे। लेकिन जैसे-जैसे इस्लाम की आवाज़ मक्का में फैलने लगी, कुरैश का मुख़ालफ़त भी बढ़ती गई। मुसलमानों को तरह-तरह की तकलीफ़ें दी जाने लगी।

कुछ को मारा गया तो कुछ को सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा और कुछ को अपना घर छोड़कर हबशा की तरफ़ हिजरत करनी पड़ी। लेकिन नबी ने दावत का काम कभी नहीं छोड़ा उसके आगे जारी रखा।

वह दौर जब अपने भी साथ छोड़ते चले गए

नबी की ज़िंदगी में एक ऐसा दौर भी आया जब लगातार बड़े सदमे सामने आए। आपके चचा अबू तालिब का भी इंतिकाल ही गया था। इसके कुछ समय बाद आपकी प्यारी बीवी हज़रत ख़दीजा भी इस दुनिया से चली गईं। यह साल नबी के लिए बेहद ग़म का साल था। लेकिन इन मुश्किलों के बावजूद आपने, अल्लाह की तरफ़ लोगो को बुलाने का काम जारी रखा।

ताइफ़ का सफ़र

मक्का में हालात सख़्त हुए तो नबी ए करीम ताइफ़ की तरफ़ हिजरत की। आप वहाँ इस उम्मीद से गए कि वहां सभी लोग अल्लाह का पैग़ाम सुनेंगे। लेकिन वहाँ आपको वह इज़्ज़त नहीं मिली जिसकी उम्मीद थी। अल्लाहु अकबर आपको बहुत तकलीफ़ दी गई और पत्थर मारे गए। यह आपकी ज़िंदगी के बेहद दर्दनाक दिनों में से था। लेकिन उस तकलीफ़ के बीच भी आपका रिश्ता अल्लाह से कभी नहीं टूटा।

यही सीरत का वह पहलू है जिसे पढ़कर इंसान समझता है कि नबी की ज़िंदगी सिर्फ़ कामयाबी की कहानी नहीं थी – यह सब्र, दावत और अल्लाह पर भरोसे की कहानी भी थी।

इसरा और मेराज

इसके बाद नबी करीम ﷺ की ज़िंदगी में इसरा और मेराज (Isra and Miraj) का मुबारक वाक़िया पेश आया। कुरआन की सूरह अल-इसरा की पहली आयत में मस्जिद अल-हराम से मस्जिद अल-अक्सा तक रात के सफ़र का ज़िक्र है। इसी मुबारक सफ़र से जुड़ी सहीह अहादीस में आसमानों की तरफ़ उठाए जाने और पाँच वक्त की नमाज़ के फ़र्ज़ होने का ज़िक्र मिलता है। यह नबी की ज़िंदगी का एक बेहद अहम और मुबारक पड़ाव था।

मदीना की तरफ़ हिजरत

जब मक्का में हालात लगातार बहुत मुश्किल रहे थे तब अल्लाह के हुक्म से नबी और मुसलमानों ने मदीना की तरफ़ हिजरत (Hijrah to Madinah) शुरू की। नबी ने हज़रत अबू बक्र के साथ मक्का से निकलकर ग़ार-ए-सौर में पनाह ली और फिर उसके बाद मदीना की तरफ़ अपना सफ़र जारी किया। सहीह बुखारी की रिवायत में इस हिजरत के सफ़र, ग़ार में तीन रात ठहरने और रास्ते की तैयारी का ज़िक्र मिलता है। कुरआन ने इस सफ़र के उस लम्हे को हमेशा के लिए यादगार बना दिया जब नबी ने अपने साथी से कहा: “ग़म न करो, बेशक अल्लाह हमारे साथ है।” – सूरह अत-तौबा, 9:40

मदीना: एक नई शुरुआत

मदीना पहुँचकर नबी ए करीम ने सिर्फ़ एक शहर में रहना शुरू नहीं किया, बल्कि एक नए मुस्लिम समाज की बुनियाद रखी। वहाँ मस्जिद-ए-नबवी की तामीर की। मुहाजिरीन और अंसार के बीच भाईचारा कायम किया गया। लोगों को इबादत, इंसाफ़, भाईचारे और समाज की जिम्मेदारियों की तालीम दी गई। मदीना में नबी सिर्फ़ एक रसूल के तौर पर ही नहीं, बल्कि एक रहनुमा, शिक्षक और समाज के जिम्मेदार सरबराह के तौर पर भी लोगों की रहनुमाई करते रहे।

बद्र, उहुद की जंग और मुश्किल इम्तिहान

मदीना के दौर में मुसलमानों को कई बड़े इम्तिहानों का सामना करना पड़ा। ग़ज़वा-ए-बद्र (Battle of Badr) में मुसलमानों को कामयाबी मिली। इसके बाद उहुद (Battle of Uhud) का कठिन दौर आया, जिसमें कई सहाबा लड़ाई करते हुए शहीद हो गए थे और हमारे प्यारे रसूल भी घायल गए थे। फिर ग़ज़वा-ए-अहज़ाब का दौर आया, जब मदीना पर बड़ा खतरा मंडरा रहा था। इन तमाम हालात में नबी ﷺ अपनी उम्मत के बीच मौजूद रहे और उन्हें अल्लाह पर भरोसा रखने की तालीम देते रहे।

सुलह-ए-हुदैबिया: जो देखने में मुश्किल थी, मगर कामयाबी बन गई

6 हिजरी में नबी करीम अपने साहबों के साथ उमरा करने के इरादे से मक्का की तरफ़ रवाना हुए। वहां के हुक्मरानों ने मक्का में दाखिल होने की इजाज़त नहीं दी और फिर सुलह-ए-हुदैबिया (Treaty of Hudaybiyyah) हुई। शुरुआत में इसकी कुछ शर्तें सहाबा के लिए मुश्किल महसूस हुईं। लेकिन बाद में यही समझौता इस्लाम की दावत के लिए एक बड़ा रास्ता बन गया था। कुरआन ने इसे “फ़त्हन मुबीनन” – खुली कामयाबी कहा:- सूरह अल-फ़त्ह, 48:1

फ़त्ह-ए-मक्का: वह दिन जब मक्का फिर सामने था

कुछ साल पहले जिस मक्का से मुसलमानों को निकाला गया था, अब वही मक्का नबी करीम ﷺ के सामने था। 8 हिजरी में फ़त्ह-ए-मक्का हुई। नबी ﷺ मक्का में दाखिल हुए और काबा शरीफ में जितने बुत रखे थे , सभी को तोड़ कर काबे ए शरीफ को पाक किया गया। यह सिर्फ़ एक शहर की फ़त्ह नहीं थी। यह अरब में इस्लाम के इतिहास का एक बहुत बड़ा मोड़ था। और फिर वही मक्का, जिसने कभी नबी ﷺ और आपके साथियों को सताया था, अब इस्लाम के पैग़ाम को क़ुबूल करने लगा।

अरब में इस्लाम का पैग़ाम फैलता गया

फ़त्ह-ए-मक्का के बाद अरब के अलग-अलग हिस्सों से लोग इस्लाम की तरफ़ आने लगे। नबी करीम की दावत अब मक्का और मदीना तक सीमित नहीं रही थी। आप ﷺ ने अलग-अलग शासकों और क़ौमों तक भी इस्लाम का पैग़ाम पहुँचाया। लेकिन आपकी ﷺ पूरी दावत का केंद्र एक ही था: एक अल्लाह की इबादत और उसके सामने झुकना।

हज्जतुल विदा: आख़िरी हज

10 हिजरी में मुहम्मद ﷺ ने अपना आख़िरी हज अदा किया, जिसे हज्जतुल विदा (Farewell Hajj) कहा जाता है। इस मौके पर बड़ी संख्या में सहाबा رضي الله عنهم आपके साथ थे। आपने लोगों को उनके हक़, जिम्मेदारियों और दीन की अहम बातों की याद दिलाई। यह हमारे नबी की ज़िंदगी का आख़िरी बड़ा सार्वजनिक दौर था। कुरआन में इसी दौर में दीन के मुकम्मल होने की आयत भी आई:

आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन मुकम्मल कर दिया…” सूरह अल-माइदा, 5:3

आख़िरी दिन और नबी ﷺ की वफ़ात

हज्जतुल विदा के कुछ समय बाद आप बीमार हुए। आपकी बीमारी धीरे धीरे बढ़ती गई। आख़िरी दिनों में आप हज़रत आयशा के हुजरे में रहे। सहीह बुखारी की रिवायत के मुताबिक़ नबी ने वहीं बीमारी के दिनों में वक्त गुज़ारा और वहीं आपका विसाल हुआ। फिर वह दिन आया जब मदीना की गलियों पर ऐसी खामोशी छा गई जिसका दर्द सहाबा के लिए बयान करना आसान नहीं था।

हज़ूर मुहम्मद ﷺ का विसाल 11 हिजरी / 632 ईस्वी में हुआ और आपकी उम्र 63 साल थी। हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि नबी ﷺ का इंतिकाल 63 साल की उम्र में हुआ। नबी के इंतिकाल की खबर सुनकर सहाबा पर जैसे ग़म का पहाड़ टूट पड़ा हो। हज़रत उमर उस सदमे में थे। फिर हज़रत अबू बक्र आए और लोगों को याद दिलाया कि:

जो मुहम्मद ﷺ की इबादत करता था, वह जान ले कि हुज़ूर मुहम्मद ﷺ का विसाल हो चुका है, और जो अल्लाह की इबादत करता है, वह जान ले कि अल्लाह हमेशा ज़िंदा है।

फिर उन्होंने कुरआन की आयत पढ़ी:

“मुहम्मद ﷺ तो बस एक रसूल हैं, उनसे पहले भी बहुत से रसूल गुज़र चुके हैं…” सूरह आले-इमरान, 3:144

इस वाक़िए का ज़िक्र सहीह बुखारी में मिलता है।

लेकिन नबी ﷺ की सीरत यहीं खत्म नहीं होती

नबी ए करीम दुनिया से चले गए, लेकिन आपकी लाई हुई हिदायत आज भी हमारे पास मौजूद है। कुरआन हमारे पास है आप ﷺ की सुन्नत हमारे पास है। आप की सीरत हमारे सामने है। और सबसे बड़ी बात – अल्लाह ने कुरआन में साफ़ बता दिया कि रसूलुल्लाह हमारे लिए बेहतरीन नमूना हैं। यही वजह है कि नबी की ज़िंदगी को सिर्फ़ तारीख़ समझकर पढ़ना काफी नहीं।

हमें देखना चाहिए कि:

आप ﷺ कैसे बेटे थे, कैसे शौहर थे, कैसे पड़ोसी थे, कैसे रहनुमा थे, कैसे इबादत करने वाले थे और सबसे बढ़कर – अल्लाह के बंदे और उसके रसूल कैसे थे।

हज़ूर मुहम्मद ﷺ की ज़िंदगी: एक नज़र में

दौरअहम पड़ाव
पैदाइशमक्का, आमुल-फ़ील के आसपास
बचपनहज़रत आमिना رضي الله عنها, फिर दादा और चचा की सरपरस्ती
जवानीकारोबार और अल-अमीन के तौर पर पहचान
तकरीबन 25 वर्षहज़रत ख़दीजा رضي الله عنها से निकाह
तकरीबन 40 वर्षग़ार-ए-हिरा में पहली वह्य
मक्का का दौरइस्लाम की दावत और आज़माइशें
ताइफ़कठिन दावत का दौर
इसरा व मेराजमुबारक सफ़र
622 ईस्वीमदीना की हिजरत
2 हिजरीबद्र
3 हिजरीउहुद
6 हिजरीसुलह-ए-हुदैबिया
8 हिजरीफ़त्ह-ए-मक्का
10 हिजरीहज्जतुल विदा
11 हिजरी / 632 ई.मदीना में विसाल, उम्र 63 वर्ष

FAQ: हज़ूर मुहम्मद ﷺ की ज़िंदगी के बारे में

Que.1 हज़ूर मुहम्मद ﷺ का जन्म (Prophet Muhammad Birth)
कब हुआ था?
Ans. हज़ूर ﷺ की पैदाइश मक्का में आमुल-फ़ील के आसपास हुई, जिसे आम तौर पर लगभग 570 ईस्वी के करीब माना जाता है। जन्म की पुख्ता तारीख़ को लेकर सीरत की रिवायतों में मतभेद है।

Que.2 हज़ूर मुहम्मद ﷺ के वालिद का नाम क्या था?
Ans. आप ﷺ के वालिद का नाम अब्दुल्लाह और वालिदा का नाम आमिना رضي الله عنها था।

Que.3 नबी करीम ﷺ पर पहली वह्य कब आई?
Ans. नबी करीम ﷺ पर लगभग 40 साल की उम्र में ग़ार-ए-हिरा में पहली वह्य आई। इसकी विस्तृत रिवायत सहीह बुखारी में हज़रत आयशा رضي الله عنها से मिलती है।

Que.4 हज़ूर ﷺ ने मदीना की हिजरत कब की?
Ans. नबी करीम ﷺ ने मक्का से मदीना की हिजरत 622 ईस्वी में की। यही हिजरत बाद में इस्लामी हिजरी कैलेंडर की शुरुआत का आधार बनी।

Que.5 नबी ﷺ का सबसे बड़ा मिशन क्या था?
Ans. आप ﷺ का मुख्य मिशन लोगों को एक अल्लाह की इबादत, सही ईमान और अल्लाह की बताई हुई ज़िंदगी की तरफ़ बुलाना था।

Que.6 नबी करीम ﷺ की वफ़ात कब हुई?
Ans. आप ﷺ का विसाल 11 हिजरी / 632 ईस्वी में मदीना में हुआ। सहीह बुखारी की रिवायत के मुताबिक़ आपकी उम्र उस समय 63 वर्ष थी।

Que.7 नबी ﷺ को कहाँ दफ़न किया गया?
Ans. आप ﷺ का विसाल जिस हुजरे में हुआ, उसी जगह आपको दफ़न किया गया। आज यह स्थान मस्जिद-ए-नबवी, मदीना के मुबारक हिस्से में है।

निष्कर्ष: यह सिर्फ़ एक ज़िंदगी की कहानी नहीं

ज़ूर मुहम्मद ﷺ की पूरी ज़िंदगी (Prophet Muhammad Biography) को पढ़ते हुए एक बात बार-बार दिल में आती है – यह सिर्फ़ एक इंसान के जन्म, जवानी, नुबूवत और वफ़ात की कहानी नहीं है। यह उस नबी की कहानी है जिसने यतीमी से ज़िंदगी शुरू की, मक्का में तकलीफ़ें देखीं, ताइफ़ में पत्थर खाए, हिजरत की, मदीना में एक उम्मत को जोड़ा और फिर अपनी ज़िंदगी के आख़िरी दौर में अरब को एक अल्लाह की तरफ़ बुलाने का पैग़ाम पहुँचा दिया।

कुरआन ने आपके ﷺ बारे में कहा:

“और बेशक आप ﷺ बुलंद अख़लाक़ पर हैं।” सूरह अल-क़लम, 68:4

और फिर हमारी रहनुमाई के लिए फरमाया कि रसूलुल्लाह ﷺ में हमारे लिए बेहतरीन नमूना है। इसलिए सीरत पढ़ने के बाद सबसे खूबसूरत सवाल यह नहीं कि “मैंने नबी ﷺ के बारे में कितना जान लिया?”

बल्कि यह है:

“मैंने नबी ﷺ की ज़िंदगी से अपनी ज़िंदगी को कितना बेहतर बनाया?”

अल्लाह तआला हमें अपने प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ की सच्ची मोहब्बत अता फरमाए, उनकी सीरत को समझने की तौफ़ीक़ दे और उनकी सुन्नत के मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारने वाला बनाए।

आमीन या रब्बल आलमीन।

Mohammad Naushad

अस्सलामु अलैकुम! मेरा नाम मौहम्मद नौशाद है और मैं Deen Ki Roshni का फ़ाउंडर हूँ। मैं क़ुरआन, सहीह हदीस और भरोसेमंद इस्लामी किताबों की रोशनी में आसान हिंदी में इस्लामी मालूमात आप तक पहुँचाने की कोशिश करता हूँ। अगर मेरे लिखे हुए लेखों से किसी एक इंसान को भी दीन की सही समझ हासिल हो जाए, तो मैं इसे अपने लिए अल्लाह की बड़ी नेमत समझता हूँ।

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