आशूरा 2027: 10 मुहर्रम (10 Muharram) का मुबारक दिन इतना ख़ास क्यों है?

परिचय: कर्बला (Karbala) का वो दर्द जो आज भी ज़िंदा है

जब भी मुहर्रम (Muharram) का चाँद आसमान पर नमूदार होता है, तो ऐसा लगता है जैसे कायनात का हर ज़र्रा ग़म में मुब्तिला हो गया हो। आशूरा 2027 (Ashura 2027) का यह मुबारक दिन सिर्फ़ एक तारीख़ या कैलेंडर का एक पन्ना नहीं है, बल्कि यह उस दर्द, उस प्यास और उस कुर्बानी की याद दिलाता है जिसने ज़मीन-ओ-आसमान को रुला दिया था।

आप तसव्वुर कीजिए कर्बला (Karbala) का वह तपता हुआ सहरा, जहाँ एक तरफ़ बरछियों और नफ़रतों का समंदर था और दूसरी तरफ़ तीन दिन से प्यासे नबी मुहम्मद ﷺ के प्यारे घरवाले। छह महीने के मासूम हज़रत अली असग़र (रज़ियल्लाहु अन्हु) से लेकर हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) तक, सबने हक़ की राह में कुर्बानी दी, लेकिन बातिल के आगे अपना सिर नहीं झुकाया।

जब हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने अपने पूरे घर को अपनी आँखों के सामने कुर्बान होते देखा, तब भी उनका सिर ख़ुदा के सज्दे में ही झुका रहा। यह मुहर्रम (Muharram) का वह दर्द है जो पत्थर से पत्थर दिल को भी पिघला देता है, हर किसी की आँखों से आँसुओं का समंदर बहा देता है और हर उस शख़्स को मजबूर कर देता है कि वह इस दास्तान-ए-इश्क़ और कुर्बानी के एक-एक लफ़्ज़ को अपने दिल में उतार ले और इस पूरे पैग़ाम को आख़िरी लफ़्ज़ तक ज़रूर पढ़े।

आशूरा 2027 (Ashura 2027) कब है?

हर साल की तरह इस साल भी पूरी दुनिया में रहने वाले मुसलमान इस मुक़द्दस दिन का शिद्दत से इंतज़ार कर रहे हैं, ताकि इस मुबारक महीने की रूहानी बरकतों से अपने दामन को भर सकें।

हिजरी कैलेंडर के मुताबिक़, मुहर्रम (Muharram) की 10वीं तारीख़ को यौम-ए-आशूरा (Yaum-e-Ashura) कहा जाता है। अगर आप जानना चाहते हैं कि इस साल मुहर्रम 2027 (Muharram 2027) कब है (Muharram kab hai ?) और इसकी फ़ज़ीलत क्या है, तो हमारा मुकम्मल आर्टिकल ज़रूर पढ़ें।

साल 2027 में भारत, पाकिस्तान और दुनिया के कई अन्य देशों में 10 मुहर्रम (10 Muharram) का मुबारक दिन, चाँद दिखाई देने के अनुसार, अनुमानित रूप से 16 जून 2027 के आसपास हो सकता है। अलग-अलग देशों में चाँद की रुइयत (चाँद दिखाई देने) के आधार पर तारीख़ में एक दिन का अंतर हो सकता है।

यह रूहानी दिन अल्लाह की इबादत करने, अपने गुनाहों की माफ़ी माँगने और क़ुरआन की तिलावत करने के लिए बहुत ख़ास माना जाता है। क्योंकि इस दिन की गई दुआओं को अल्लाह तआला की बारगाह में जल्द मक़बूलियत मिलती है और मोमिनों का दिल अपने रब की बारगाह में झुक जाता है।

आशूरा का तारीखी पसमंजर और कर्बला की कुर्बानी

यह मुक़द्दस दिन सिर्फ़ मातम या ग़म का दिन नहीं है, बल्कि यह हक़ और बातिल के दरमियान हुई उस अज़ीम जंग की याद है, जहाँ बातिल जीतकर भी हमेशा के लिए हार गया और हक़ अपनी जान देकर भी लोगों के दिलों में हमेशा के लिए ज़िंदा हो गया।

तारीख़ गवाह है कि हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने यज़ीद की ज़ालिम और ग़ैर-इस्लामी हुकूमत के सामने अपना सिर झुकाने से साफ़ इंकार कर दिया था। आप इमाम हुसैन की कहानी (Imam Hussain Story) और कर्बला (Karbala) के उन 72 शुहदा की पूरी दास्तान हमारे संबंधित लेख में पढ़ सकते हैं।

जो ताक़तें दीन-ए-इस्लाम की पाकीज़ा बुनियादों को हिलाने की कोशिश कर रही थीं, उनके सामने आपने अपने छोटे से काफ़िले—जिसमें औरतें और मासूम बच्चे भी शामिल थे—के साथ कर्बला (Karbala) के तपते सहरा में भूख और प्यास की शिद्दत को बर्दाश्त किया, ताकि क़यामत तक आने वाली इंसानियत यह सबक सीख सके कि चाहे गर्दन कट जाए, लेकिन बातिल के सामने सिर नहीं झुकाना चाहिए।

यह कुर्बानी किसी राज-तख़्त या दुनिया की हुकूमत के लिए नहीं थी, बल्कि हमारे और आपके ईमान को ज़िंदा रखने के लिए थी। जब इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने अपना आख़िरी सज्दा किया, तो उन्होंने पूरी उम्मत को यह सिखाया कि हर हाल में अल्लाह की रज़ा पर राज़ी रहना ही असली दीन और ईमान की पहचान है।

उनकी इस पाकीज़ा कुर्बानी ने इस्लाम को उगते हुए सूरज की तरह नई ज़िंदगी दी। इसलिए किसी शायर ने क्या ख़ूब कहा है-“इस्लाम ज़िंदा होता है हर कर्बला के बाद।”

यौम-ए-आशूरा (Yaum-e-Ashura) की रूहानी अहमियत और रोज़ा

कर्बला (Karbala) के इस दर्दनाक वाक़िये से पहले भी मुहर्रम (Muharram) की 10वीं तारीख़ की अपनी एक अलग और बेहद अज़ीम तारीख़ रही है, जो इसकी रूहानी अहमियत को और भी बढ़ा देती है।

यह वह मुबारक दिन है जब अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) और उनकी क़ौम बनी इस्राईल को फ़िरऔन के ज़ुल्म-ओ-सितम से निजात दिलाई थी और दरिया को दो हिस्सों में बाँटकर उनके लिए रास्ता बना दिया था।

इस नेमत और निजात के शुक्राने में हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) इस दिन रोज़ा रखा करते थे। हमारे प्यारे नबी मुहम्मद ﷺ ने भी इस दिन रोज़ा रखने की ताकीद फ़रमाई है।

यौम-ए-आशूरा (Yaum-e-Ashura) की रूहानी अहमियत और 10 मुहर्रम (10 Muharram) के रोज़े का इस्लाम में बहुत बड़ा मक़ाम है।

Yaum-e-Ashura ki roohani ahmiyat aur 10 Muharram ka roza in Islam

हदीस-ए-मुबारका: हज़रत अबू क़तादा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया:

मुझे अल्लाह से उम्मीद है कि आशूरा के दिन का रोज़ा पिछले एक साल के गुनाहों का कफ़्फ़ारा बन जाएगा। (सहीह मुस्लिम)

इसीलिए सुन्नत के मुताबिक़ केवल 10 मुहर्रम (10 Muharram) का रोज़ा रखने के बजाय 9 और 10 मुहर्रम, या 10 और 11 मुहर्रम का रोज़ा रखना बेहतर माना गया है, ताकि दूसरी क़ौमों से फ़र्क़ भी स्पष्ट रहे।

आशूरा की दुआ और ज़ियारत-ए-आशूरा (Ziyarat-e-Ashura) की अहमियत

10 मुहर्रम (10 Muharram) का मुबारक दिन रोज़ा, तिलावत और इबादत का दिन है। इसी दिन कुछ ख़ास दुआएँ और ज़ियारत-ए-आशूरा (Ziyarat-e-Ashura) पढ़ना भी बहुत अफ़ज़ल माना जाता है।

  • दुआ-ए-आशूरा (Dua-e-Ashura): सुन्नी और शिया—दोनों मसलक के लोग इस मुबारक दिन दुआ करने पर ज़ोर देते हैं। माना जाता है कि जो शख़्स इस दिन सच्चे दिल से अल्लाह से दुआ करता है, अल्लाह तआला उसकी हिफ़ाज़त फ़रमाता है और उसके रिज़्क़ में बरकत अता करता है।
  • ज़ियारत-ए-आशूरा (Ziyarat-e-Ashura): शिया भाइयों के यहाँ इस दिन ज़ियारत-ए-आशूरा (Ziyarat-e-Ashura) की तिलावत का बहुत ऊँचा मक़ाम है। यह ज़ियारत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) और शुहदा-ए-कर्बला के प्रति अपनी अकीदत और उनके ग़म को याद करने का एक अहम ज़रिया मानी जाती है।

दुआ के अहम अल्फ़ाज़ और उनका रूहानी मतलब

इस दुआ की शुरुआत इन अल्फ़ाज़ से होती है—
“या क़ाबिला तौबति आदमा यौम-अशूरा, या फ़ारिजा करबी ज़िन्नूनी यौम-अशूरा……”

आसान हिंदी अनुवाद

“ऐ आशूरा (Ashura) के दिन हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) की तौबा क़बूल फ़रमाने वाले! ऐ आशूरा के दिन हज़रत यूनुस (अलैहिस्सलाम) की ग़म और परेशानी दूर करने वाले! ऐ आशूरा के दिन हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) और बनी इस्राईल को दुश्मन से निजात देने वाले! मेरी दुआ भी क़बूल फ़रमा।”

Complete Dua e Ashura text along with Ashura ki Dua translation and Ziyarat e Ashura details.

दुआ-ए-आशूरा (Dua-e-Ashura) पढ़ने का तरीका और फ़ज़ीलत

  • कब पढ़ें?: इस दुआ को 10 मुहर्रम (10 Muharram) के दिन सुबह से लेकर मग़रिब तक किसी भी समय पढ़ा जा सकता है।
  • कितनी बार पढ़ें?: बुज़ुर्गान-ए-दीन के अनुसार इस मुबारक दुआ को 7 बार पढ़ना बहुत अफ़ज़ल माना गया है।
  • फ़ज़ीलत: रिवायतों में आता है कि जो शख़्स इस दिन सच्चे दिल से यह दुआ पढ़ता है, अल्लाह तआला पूरे साल उसकी ज़िंदगी, माल और इज़्ज़त की हिफ़ाज़त फ़रमाता है तथा उसे अचानक आने वाली मुसीबतों और बीमारियों से महफ़ूज़ रखता है।

नोट: उपरोक्त फ़ज़ीलत आम तौर पर प्रचलित रिवायतों में बयान की जाती है। ऐसे फ़ज़ाइल बयान करते समय हमेशा उनकी सनद और विश्वसनीय इस्लामी स्रोतों की जाँच करना बेहतर है।

शिया और सुन्नी का नज़रिया: एक ही ग़म, दो अंदाज़-ए-इबादत

जब बात आशूरा (Ashura) और कर्बला (Karbala) के इस अज़ीम ग़म की आती है, तो शिया और सुन्नी—दोनों के दिल हज़रत इमाम हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) की मोहब्बत और एहतराम से भर जाते हैं। अंतर केवल इबादत और याद करने के तरीक़े में है।

मकतब-ए-फ़िक्रतर्ज़-ए-अमल (इबादत का तरीका)
शियाइस दिन को ग़म, मातम और अज़ादारी के रूप में मनाते हैं। मजलिस आयोजित करते हैं, ताज़िये निकालते हैं और शुहदा-ए-कर्बला की याद में अपने ग़म का इज़हार करते हैं।
सुन्नीWअहल-ए-बैत से मोहब्बत रखते हुए इस दिन इबादत, ज़िक्र-ए-इलाही, रोज़ा रखने, क़ुरआन की तिलावत, दुआ तथा ग़रीबों को खाना खिलाने (नियाज़/सबील) और इसाल-ए-सवाब पर ज़ोर देते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल FAQs:

Que 1: आशूरा 2027 (Ashura 2027) कब है और इसकी अनुमानित तारीख़ क्या होगी?
Ans: इस्लामी (हिजरी) कैलेंडर के मुताबिक़ 10 मुहर्रम 1449 हिजरी (10 Muharram 1449 AH) को यौम-ए-आशूरा (Yaum-e-Ashura) मनाया जाएगा। अंग्रेज़ी कैलेंडर के अनुसार यह अनुमानित रूप से 16 जून 2027 को पड़ सकता है। हालांकि, चाँद दिखाई देने (रुइयत-ए-हिलाल) के आधार पर अलग-अलग देशों में तारीख़ में एक दिन का अंतर हो सकता है।

Que 2: मुहर्रम के महीने में आशूरा के दिन रोज़ा रखने का सही तरीका क्या है?
Ans: सुन्नत के मुताबिक़ केवल एक दिन का रोज़ा रखने के बजाय 9 और 10 मुहर्रम (9 & 10 Muharram) या 10 और 11 मुहर्रम (10 & 11 Muharram) का रोज़ा रखना बेहतर है। यही तरीका नबी मुहम्मद ﷺ की सुन्नत के अधिक क़रीब माना गया है।

Que 3: क्या आशूरा का दिन सिर्फ़ ग़म मनाने के लिए है?
Ans: नहीं। यह दिन केवल ग़म की याद तक सीमित नहीं है, बल्कि हक़ पर डटे रहने, सब्र करने, अल्लाह की राह में कुर्बानी देने और अपने ईमान को मज़बूत करने का पैग़ाम भी देता है। यह दिन इबादत, रोज़ा, दुआ, तिलावत और शुक्रगुज़ारी का भी दिन है।

Que 4: आशूरा (Ashura) के दिन कौन-सी दुआ पढ़ी जाती है और उसकी क्या फ़ज़ीलत है?
Ans: इस दिन ख़ास तौर पर दुआ-ए-आशूरा (Dua-e-Ashura) पढ़ी जाती है। आम रिवायतों के अनुसार, जो व्यक्ति इस दिन सच्चे दिल से यह दुआ पढ़ता है, अल्लाह तआला उसकी हिफ़ाज़त फ़रमाता है और उसे अपनी रहमत से नवाज़ता है

Que 5: क्या आशूरा का रोज़ा फ़र्ज़ है?
Ans: नहीं। आशूरा का रोज़ा फ़र्ज़ नहीं है, बल्कि सुन्नत और अत्यंत फ़ज़ीलत वाला अमल है। जो व्यक्ति इसे अल्लाह की रज़ा के लिए रखता है, उसे बहुत अधिक सवाब मिलने की उम्मीद की जाती है।

Que 6: आशूरा (Ashura) के दिन क्या करना चाहिए और किन कामों से बचना चाहिए?
Ans: इस दिन अल्लाह का ज़िक्र, क़ुरआन की तिलावत, रोज़ा, दुआ, सदक़ा और ज़रूरतमंदों की मदद जैसे नेक काम करने चाहिए। साथ ही ऐसे कार्यों से बचना चाहिए जो इस दिन की पवित्रता, एहतराम और गंभीरता के ख़िलाफ़ हों।

Que 7:भारत और पाकिस्तान में आशूरा 2027 (Ashura 2027) कब है?
Ans: यदि मुहर्रम 1449 हिजरी (Muharram 1449 AH) का चाँद अनुमानित समय पर दिखाई देता है, तो भारत और पाकिस्तान में यौम-ए-आशूरा (10 मुहर्रम) लगभग 16 जून 2027 को होने की संभावना है। अंतिम तारीख़ स्थानीय रुइयत-ए-हिलाल (चाँद देखने) की घोषणा पर निर्भर करेगी।

निष्कर्ष: कर्बला का पैग़ाम और हमारी ज़िम्मेदारी

आशूरा 2027 (Ashura 2027) का यह मुबारक अवसर केवल आँसू बहाने या इतिहास दोहराने का नाम नहीं है, बल्कि यह अपने अंदर के यज़ीदी किरदार को समाप्त करके हुसैनी किरदार को ज़िंदा करने का दिन है। कर्बला (Karbala) की तपती ज़मीन ने पूरी इंसानियत को यह सिखाया कि हालात चाहे कितने ही मुश्किल क्यों न हों, जब इंसान हक़ के साथ डटकर खड़ा होता है, तो अल्लाह की मदद और रज़ा उसके साथ होती है।

आइए, इस अज़ीम दिन पर हम सब यह अहद करें कि हम नफ़रतों को मिटाएँगे, मज़लूमों का साथ देंगे, सच्चाई और इंसाफ़ का दामन कभी नहीं छोड़ेंगे और दीन-ए-इस्लाम की पाकीज़ा तालीमात पर अपनी आख़िरी साँस तक क़ायम रहने की कोशिश करेंगे।

यही शुहदा-ए-कर्बला (Shuhada-e-Karbala) के लिए हमारी सच्ची मोहब्बत, एहतराम और ख़िराज-ए-अक़ीदत होगा।

Mohammad Naushad

अस्सलामु अलैकुम! मेरा नाम मौहम्मद नौशाद है और मैं Deen Ki Roshni का फ़ाउंडर हूँ। मैं क़ुरआन, सहीह हदीस और भरोसेमंद इस्लामी किताबों की रोशनी में आसान हिंदी में इस्लामी मालूमात आप तक पहुँचाने की कोशिश करता हूँ। अगर मेरे लिखे हुए लेखों से किसी एक इंसान को भी दीन की सही समझ हासिल हो जाए, तो मैं इसे अपने लिए अल्लाह की बड़ी नेमत समझता हूँ।

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