मोबाइल में क़ुरआन पढ़ना सही है या ग़लत? जानिए हैरान कर देने वाला इस्लामी हुक्म

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मोबाइल में क़ुरआन पढ़ना सही है या ग़लत?

आजकल की डिजिटल दुनिया में हम सभी के पास स्मार्टफ़ोन ज़रूर हैं। जहाँ हम मोबाइल का इस्तेमाल दूसरे कामों के लिए करते हैं, वहीं अल्हम्दुलिल्लाह, अब Mobile Quran App के ज़रिए क़ुरआन-ए-पाक की तिलावत करना भी बहुत आसान हो गया है। लोग सफ़र में, दफ़्तर में या घर पर बैठे सुकून से Digital Quran पढ़ते हैं।

लेकिन इस आसानी के साथ-साथ बहुत से मुसलमानों के ज़ेहन में कुछ अहम सवाल आते हैं। क्या मोबाइल में क़ुरआन पढ़ने के लिए वुज़ू ज़रूरी है? क्या हम बिना वुज़ू के मोबाइल स्क्रीन पर क़ुरआन की आयतों को टच कर सकते हैं? और क्या फ़िज़िकल क़ुरआन और मोबाइल क़ुरआन के अहकाम बिल्कुल एक जैसे हैं?

इन सभी सवालों का सही जवाब जानना हर मुसलमान के लिए बहुत ज़रूरी है, ताकि हम बिना किसी शक़-ओ-शुब्हा के सही इस्लामी तरीके से इबादत कर सकें। इस मुकम्मल लेख में हम क़ुरआन, सहीह अहादीस और बड़े उलेमा-ए-इकराम की राय की रोशनी में इन तमाम मसाइल को बिल्कुल आसान हिंदी में समझेंगे।

मोबाइल में क़ुरआन पढ़ना क्या मुशहफ़ के हुक्म में आता है?

सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि एक Physical Quran (जिसे शरीअत की इस्तिलाह में मुशहफ़ कहा जाता है) और एक Mobile Quran App में क्या फ़र्क है।

  • Printed Quran (मुशहफ़): यह वह किताबी शक्ल है जिसमें क़ुरआन की आयतें काग़ज़ पर स्थायी रूप से लिखी होती हैं। यह हमेशा क़ुरआन ही रहता है।
  • Mobile App / Digital Screen: मोबाइल के अंदर मौजूद क़ुरआन दरअसल डिजिटल डेटा और इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल्स की शक्ल में होता है। जब आप ऐप खोलते हैं, तो स्क्रीन पर अक्षर दिखाई देते हैं और जब ऐप बंद करते हैं, तो वे गायब हो जाते हैं।

इसी वजह से बहुत से समकालीन उलेमा-ए-इकराम फ़रमाते हैं कि मोबाइल स्क्रीन पर दिखाई देने वाला क़ुरआन, फ़िज़िकल मुशहफ़ के हुक्म में नहीं आता। मोबाइल एक ऐसा उपकरण है जिसमें क़ुरआन के अलावा कॉल, मैसेज, फ़ोटो और दूसरी बहुत-सी चीज़ें भी होती हैं। इसलिए इसे हर समय “मुशहफ़” नहीं कहा जा सकता।

क्या मोबाइल में क़ुरआन पढ़ने के लिए वुज़ू ज़रूरी है?

यह इस विषय का सबसे अहम सवाल है। आइए, इसे उलेमा की राय की रोशनी में समझते हैं।

अधिकांश उलेमा की राय

दुनिया के बड़े इस्लामी शोध संस्थानों और उलेमा का इस बात पर लगभग इत्तिफ़ाक़ है कि मोबाइल में क़ुरआन पढ़ने के लिए वुज़ू फ़र्ज़ या अनिवार्य नहीं है। यदि आपका वुज़ू नहीं है, तब भी आप मोबाइल स्क्रीन खोलकर क़ुरआन शरीफ़ की तिलावत कर सकते हैं।

मोबाइल स्क्रीन को छूना और मुशहफ़ को छूना

उलेमा इसकी वजह यह बताते हैं कि जब आप मोबाइल स्क्रीन पर उंगली रखते हैं, तो आप सीधे तौर पर काग़ज़ पर लिखी हुई आयतों को नहीं छू रहे होते, बल्कि एक काँच की स्क्रीन को छू रहे होते हैं जिसके पीछे डिजिटल पिक्सेल दिखाई देते हैं। यह कुछ उसी तरह है जैसे कोई व्यक्ति फ़िज़िकल क़ुरआन के ऊपर एक पारदर्शी शीशा रख दे और उस शीशे को छुए।

Note: हालाँकि बिना वुज़ू मोबाइल से क़ुरआन पढ़ना बिल्कुल जायज़ है, लेकिन उलेमा फ़रमाते हैं कि यदि आप वुज़ू करके मोबाइल से भी तिलावत करें तो यह मुस्तहब (अनुशंसित) और अफ़ज़ल है, क्योंकि यह अल्लाह के कलाम का अदब है।

फ़िज़िकल क़ुरआन को छूने के लिए क्या वुज़ू ज़रूरी है?

जब बात काग़ज़ वाले असली क़ुरआन शरीफ़ (मुशहफ़) को हाथ लगाने की आती है, तो उसका हुक्म अलग है। अल्लाह तआला क़ुरआन-ए-मजीद में फ़रमाता है-

لَّا يَمَسُّهُ إِلَّا الْمُطَهَّرُونَ (Surah Al-Waqiah, Ayat: 79)

Urdu Translation: “उसे केवल वही लोग छू सकते हैं जो पाक-साफ़ हों।”

कई मुफस्सिरीन के अनुसार सूरह अल-वाकिआह (56:79) का संदर्भ लौह-ए-महफ़ूज़ और फ़रिश्तों से है। हालांकि चारों सुन्नी फ़िक़्ही मज़ाहिब ने अन्य दलीलों, विशेषकर “لا يمس القرآن إلا طاهر” वाली रिवायत और सहाबा के अमल के आधार पर यह मत अपनाया है कि मुशहफ़ को बिना वुज़ू छूना जायज़ नहीं है।

फ़िक़्ही मज़ाहिब की राय (चारों इमामों के मत)

फ़िज़िकल क़ुरआन (मुशहफ़) को बिना वुज़ू छूने के बारे में चारों बड़े फ़िक़्ही मज़ाहिब की राय इस प्रकार है—

  • Hanafi View: बिना वुज़ू के फ़िज़िकल मुशहफ़ को छूना जायज़ नहीं है, चाहे आप पूरी किताब को छुएँ या उसकी केवल एक आयत को।
  • Shafi’i View: मुशहफ़, उसके जिल्द (कवर) और उसके काग़ज़ को बिना वुज़ू के छूना नाजायज़ (हराम) है।
  • Maliki View: इनके नज़दीक भी तहारत (वुज़ू) शर्त है। हाँ, जो बच्चे क़ुरआन सीख रहे हों या जो उस्ताद क़ुरआन पढ़ा रहे हों, उनके लिए कुछ रुख़्सत (छूट) दी गई है।
  • Hanbali View: बिना वुज़ू के फ़िज़िकल क़ुरआन को छूना सख़्ती से मना है।

मज़बूत राय (Rajeh Qoul): लगभग तमाम उलेमा का इस बात पर इत्तिफ़ाक़ है कि बिना वुज़ू के काग़ज़ वाले क़ुरआन शरीफ़ (मुशहफ़) को हाथ लगाना जायज़ नहीं है। इसलिए जब भी आप किताबी शक्ल वाले क़ुरआन की तिलावत करें, पहले वुज़ू ज़रूर करें।

सबसे पहले इंसान पर, चाहे वह मर्द हो या औरत, नमाज़ फ़र्ज़ है। अगर आप नमाज़ के बारे में विस्तार से पढ़ना चाहते हैं, तो हमारा यह लेख पढ़ें: नमाज़ की अहमियत: मरयम और हुसैन की इबादत का असर।

अगर मोबाइल में WhatsApp या Browser में क़ुरआन की आयत हो तो?

अक्सर हमें WhatsApp पर कोई इस्लामी मैसेज मिलता है जिसमें क़ुरआन की आयत लिखी होती है, या हम Google Browser पर कोई आयत खोजते हैं। ऐसे मामलों का क्या हुक्म है?

  1. WhatsApp aur Images: अगर किसी इमेज या मैसेज में क़ुरआन की आयत लिखी है, तो उसे बिना वुज़ू देखना, पढ़ना और मोबाइल स्क्रीन को छूना पूरी तरह जायज़ है।
  2. PDF aur Screenshots: अगर PDF फ़ाइल में पूरा क़ुरआन भी हो, तब भी मोबाइल को बिना वुज़ू छूने में कोई गुनाह नहीं है, क्योंकि स्क्रीन को छूने से डिजिटल क़ुरआन का हुक्म फ़िज़िकल मुशहफ़ जैसा नहीं हो जाता।

क्या जनाबत या हैज़ की हालत में मोबाइल से क़ुरआन पढ़ सकते हैं?

यह एक बहुत ही अहम और संवेदनशील मसला है, जिसे हर मर्द और औरत के लिए समझना ज़रूरी है। जनाबत (जब ग़ुस्ल फ़र्ज़ हो), हैज़ (मासिक धर्म) और निफ़ास (बच्चा पैदा होने के बाद का ख़ून) की हालत में कुछ अहकाम अलग हो जाते हैं।

जनाबत की हालत (जब ग़ुस्ल फ़र्ज़ हो)

अगर कोई व्यक्ति जनाबत की हालत में है, तो उसके लिए ज़ुबानी या मोबाइल से क़ुरआन की तिलावत करना जायज़ नहीं है, जब तक वह ग़ुस्ल न कर ले। नबी ﷺ से साबित है कि आपको जनाबत के अलावा कोई चीज़ क़ुरआन पढ़ने से नहीं रोकती थी।(सुनन अबू दाऊद)

हैज़ और निफ़ास के दौरान

इस मसले में उलेमा के बीच कुछ मतभेद पाया जाता है।

  • Hanafi, Shafi’i, aur Hanbali Madhhab: Iइनके अनुसार हैज़ की हालत में औरत के लिए क़ुरआन की तिलावत करना, चाहे ज़ुबानी हो या मोबाइल से, जायज़ नहीं है।
  • Maliki Madhhab aur Baaz Bade Muhadditheen: जैसे इमाम इब्न तैमिय्या के अनुसार, अगर कोई औरत तालीब-ए-इल्म हो या उसे क़ुरआन भूल जाने का डर हो, तो उसके लिए हैज़ के दौरान क़ुरआन पढ़ने की गुंजाइश है, क्योंकि हैज़ का समय कई दिनों तक रहता है।

मज़बूत और एहतियात वाली राय: आज के बहुत से उलेमा फ़रमाते हैं कि हैज़ की हालत में यदि कोई औरत तालीबा (विद्यार्थी) या क़ुरआन की शिक्षिका हो, तो वह मोबाइल स्क्रीन को सीधे छुए बिना या किसी कपड़े की मदद से स्क्रीन स्क्रॉल करके केवल देखकर दिल में या ज़िक्र की नीयत से पढ़ सकती है। लेकिन आम परिस्थितियों में तिलावत से परहेज़ करना और ज़िक्र, दुआ तथा अन्य इबादतों पर ध्यान देना अधिक बेहतर और एहतियात वाला अमल है।

क्या मोबाइल को बिना वुज़ू छूना जायज़ है?

हाँ, बिल्कुल जायज़ है। जब आपका मोबाइल बंद हो या उसकी स्क्रीन पर क़ुरआन शरीफ़ खुला हुआ न हो, तो उसे बिना वुज़ू छूने में कोई हरज नहीं है। यहाँ तक कि अगर मोबाइल में क़ुरआन ऐप खुली हुई भी हो, तब भी स्क्रीन को छूना जायज़ है, जैसा कि ऊपर स्पष्ट किया गया है। मोबाइल हमेशा क़ुरआन नहीं बन जाता, बल्कि वह एक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण ही रहता है।

क्या मोबाइल से क़ुरआन पढ़ने का सवाब भी मिलता है?

कुछ लोगों का मानना है कि मोबाइल से क़ुरआन पढ़ने पर वह सवाब नहीं मिलता जो असली क़ुरआन शरीफ़ से पढ़ने पर मिलता है। यह एक ग़लतफ़हमी है।

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

“जो अल्लाह की किताब का एक हरफ़ पढ़ता है, उसे एक नेकी मिलती है, और एक नेकी दस गुना बढ़ा दी जाती है। मैं यह नहीं कहता कि ‘अलिफ़-लाम-मीम’ एक हरफ़ है, बल्कि अलिफ़ एक हरफ़ है, लाम एक हरफ़ है और मीम एक हरफ़ है।” (Sunan At-Tirmidhi: 2910)

अल्लाह तआला आपकी नीयत और कोशिश को देखता है। चाहे आप काग़ज़ वाले क़ुरआन से पढ़ें या मोबाइल स्क्रीन से, अगर आपका मक़सद अल्लाह की रज़ा हासिल करना और सही तरीके से तिलावत करना है, तो इंशाअल्लाह आपको हर एक हरफ़ पर दस नेकियों का सवाब मिलेगा।

मोबाइल में क़ुरआन पढ़ने के आदाब

मोबाइल से क़ुरआन पढ़ना आसान ज़रूर है, लेकिन चूँकि यह अल्लाह का पाक कलाम है, इसलिए इसके कुछ आदाब हैं जिनका ख़याल रखना बहुत ज़रूरी है।

  • इख़लास (सच्ची नीयत:आपकी नीयत केवल अल्लाह को राज़ी करना हो, दिखावा करना नहीं।
  • Notifications बंद करें (DND Mode): जब आप मोबाइल में क़ुरआन पढ़ना शुरू करें, तो बेहतर है कि इंटरनेट या नोटिफ़िकेशन बंद कर दें, ताकि WhatsApp, Instagram, Facebook या अन्य ऐप्स के संदेश आपका ध्यान न भटकाएँ।
  • पाक-साफ़ माहौल चुनें: ऐसी जगह बैठें जो साफ़-सुथरी और सम्मानजनक हो। शोर-शराबे और ऐसे माहौल से बचें जहाँ आपका ध्यान बार-बार भटकता हो।
  • ख़ुशू और ध्यान के साथ तिलावत करें: Jजल्दी-जल्दी ख़त्म करने के बजाय, ठहर-ठहरकर, समझते हुए और तदब्बुर (गहराई से विचार) के साथ क़ुरआन पढ़ें।
  • बैतुल-ख़ला (वॉशरूम) के अहकाम: जब आप वॉशरूम जाएँ, तो बेहतर है कि मोबाइल में क़ुरआन ऐप खुली हुई न हो। यदि ऐप बंद है और स्क्रीन पर क़ुरआन दिखाई नहीं दे रहा है, तो मोबाइल को जेब में लेकर जाने में कोई गुनाह नहीं है।

आम ग़लतफ़हमियाँ (Common Misconceptions)

ग़लतफ़हमीहक़ीक़त
मोबाइल में मौजूद क़ुरआन और फ़िज़िकल मुशहफ़ का हुक्म एक ही है।ग़लत। दोनों के डिजिटल और फ़िज़िकल होने की वजह से उनके अहकाम अलग हैं।
बिना वुज़ू Mobile Screen पर क़ुरआन को छूना गुनाह है।ग़लत। यह जायज़ है। हाँ, वुज़ू करके पढ़ना अधिक अफ़ज़ल है।
जिस फ़ोन में Quran App हो, उसे वॉशरूम में नहीं ले जा सकते।ग़लत। यदि ऐप बंद है और स्क्रीन पर क़ुरआन दिखाई नहीं दे रहा, तो मोबाइल साथ ले जा सकते हैं।
मोबाइल से क़ुरआन पढ़ने पर कम सवाब मिलता है।ग़लत। सवाब नीयत और तिलावत पर मिलता है, माध्यम (ज़रिया) पर नहीं।

रोज़मर्रा के लिए उपयोगी मशवरे

  1. वुज़ू की आदत बनाएँ: हालाँकि मोबाइल से क़ुरआन पढ़ने के लिए वुज़ू फ़र्ज़ नहीं है, लेकिन यदि आप हमेशा बावुज़ू रहने की आदत डालेंगे, तो इससे आपकी रूहानियत में बढ़ोतरी होगी।
  2. अच्छी क़ुरआन ऐप डाउनलोड करें: ऐसी क़ुरआन ऐप इस्तेमाल करें जिसमें विज्ञापन (Ads) न आते हों, ताकि तिलावत के दौरान कोई अनुचित विज्ञापन सामने न आए।
  3. क़ुरआन सुनने की भी आदत बनाएँ:यदि आप सफ़र में हैं या ऐसी जगह हैं जहाँ पढ़ना संभव नहीं है, तो मोबाइल से क़ुरआन सुनना भी बहुत बरकत और सवाब का काम है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

Q1: क्या बिना वुज़ू Quran App खोल सकते हैं?
उत्तर: हाँ, आप बिना वुज़ू के मोबाइल में Quran App खोल सकते हैं और उससे क़ुरआन शरीफ़ की तिलावत भी कर सकते हैं।

Q2: क्या PDF क़ुरआन और मुशहफ़ का हुक्म एक ही है?
उत्तर: नहीं। PDF क़ुरआन डिजिटल फ़ॉर्मेट में होता है, जबकि मुशहफ़ काग़ज़ पर मुद्रित होता है। इसलिए दोनों को छूने के अहकाम अलग-अलग हैं।

Q3: क्या हैज़ (मासिक धर्म) के दौरान औरत मोबाइल को छू सकती है?
उत्तर: हाँ, हैज़ की हालत में औरत मोबाइल को छू सकती है, चाहे उसमें क़ुरआन ऐप मौजूद हो। लेकिन क़ुरआन की तिलावत करने से परहेज़ करना अधिक बेहतर और एहतियात वाला अमल है।

Q4: क्या क़ुरआन की Screenshot को बिना वुज़ू छू सकते हैं?
उत्तर: हाँ, मोबाइल स्क्रीन पर मौजूद क़ुरआन की Screenshot को बिना वुज़ू छूना बिल्कुल जायज़ है।

Q5: क्या मोबाइल में क़ुरआन सुनना भी तिलावत के बराबर है?
उत्तर: क़ुरआन सुनने का अपना बहुत बड़ा सवाब है और इससे अल्लाह की रहमत नाज़िल होती है। लेकिन अपनी ज़बान से क़ुरआन की तिलावत करने का सवाब अलग और अधिक है।

Q6: अगर मोबाइल स्क्रीन पर क़ुरआन खुला हो और कोई ग़ैर-मुस्लिम उसे देखे, तो क्या हुक्म है?
उत्तर: केवल देखने में कोई हरज नहीं है। लेकिन यदि वह उसे छुए, तो उसे क़ुरआन के अदब और सम्मान का ध्यान रखने की हिदायत दी जानी चाहिए।

निष्कर्ष

इस्लाम एक आसान और फ़ितरी (प्राकृतिक) दीन है, जो इंसानों के लिए आसानी पैदा करता है। मोबाइल में क़ुरआन पढ़ना आज के दौर की एक बड़ी नेमत और सहूलियत है, जिसका फ़ायदा हर मुसलमान को उठाना चाहिए। इस पूरे लेख का ख़ुलासा यह है कि असली मुद्रित क़ुरआन शरीफ़ (मुशहफ़) को छूने के लिए वुज़ू ज़रूरी है, जबकि स्मार्टफ़ोन या डिजिटल स्क्रीन पर क़ुरआन पढ़ने और उसे छूने के लिए वुज़ू शर्त नहीं है।

फिर भी, अगर कोई व्यक्ति वुज़ू करके मोबाइल से भी क़ुरआन पढ़े, तो यह अल्लाह के कलाम का अधिक अदब और बेहतर अमल माना जाता है।

हमें चाहिए कि हम इस डिजिटल नेमत का सही इस्तेमाल करें, रोज़ाना क़ुरआन शरीफ़ की तिलावत करें और अल्लाह के कलाम का दिल से सम्मान करें। दीन के मामलों में बिना सही तहक़ीक़ के कोई बात आगे न फैलाएँ।

अगर आपको यह मार्गदर्शिका लाभदायक लगी हो, तो इसे अपने दोस्तों और परिवार के साथ ज़रूर साझा करें, ताकि सही इस्लामी जानकारी अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच सके। सदक़ा-ए-जारिया में अपना हिस्सा ज़रूर शामिल करें।

Mohammad Naushad

अस्सलामु अलैकुम! मेरा नाम मौहम्मद नौशाद है और मैं Deen Ki Roshni का फ़ाउंडर हूँ। मैं क़ुरआन, सहीह हदीस और भरोसेमंद इस्लामी किताबों की रोशनी में आसान हिंदी में इस्लामी मालूमात आप तक पहुँचाने की कोशिश करता हूँ। अगर मेरे लिखे हुए लेखों से किसी एक इंसान को भी दीन की सही समझ हासिल हो जाए, तो मैं इसे अपने लिए अल्लाह की बड़ी नेमत समझता हूँ।

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